भारतकोश
गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

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पृष्ठ 364

गीतावली ३५८ जिसने रघुनाथजीके चरणोंमें चित्त लगाया है।' तुलसीदासजी कहते हैं, रावणसे ऐसे वचन कह वानरराज बालिके पुत्र अंगदजी गरजते हुए वहांसे चल दिये ॥ ५ ॥ लक्ष्मण-मूर्च्छा राग केदारा [ ५ ] राम-लषन उर लाय लये हैं। भरे नीर राजीव-नयन सब अँग परिताप तए हैं॥ १ ॥ कहत ससोक बिलोकि बंधु-मुख बचन प्रीति गुथए हैं। सेवक-सखा भगति-भायप-गुन चाहत अब अथए हैं॥ २ ॥ निज कीरति-करतूति तात ! तुम सुकृतौ सफल जए हैं। मैं तुम्ह बिनु तनु राखि लोक अपने अपलोक लए हैं॥ ३ ॥ मेरे पनकी लाज इहाँलों हठि प्रिय प्रान दए हैं। लागति सांगि बिभीषन ही पर, सीपर आपु भए हैं॥ ४ ॥ सुनि प्रभु-बचन भालु-कपि-गन, सुर सोच सुखाइ गए हैं। तुलसी आइ पवनसुत-बिधि मानो फिरि निरमये नए हैं॥ ५ ॥ [जिस समय मेघनादकी शक्ति खाकर लक्ष्मणजी मूर्च्छित हो गये और हनुमान्जी उन्हें भगवान् रामके पास ले आये, उस समय] रघुनाथजीने लक्ष्मणजीको उठाकर हृदयसे लगा लिया। उनके नेत्र- कमल जलसे भर आये और सब अङ्ग परितापसे संतप्त हो गये ॥ १ ॥ वे भाईका मुख देखकर अत्यन्त शोकयुक्त हो ये प्रीतिग्रथित वचन कहने लगे—'अब सेवक, सखा, भक्ति भ्रातृत्वके सारे गुण अस्त होनेवाले हैं ॥ २ ॥ हे तात ! अपनी कीर्ति और कृतिसे तुमने समस्त