गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३५७ लंकाकाण्ड
[ ४ ]
सुनु खल ! मैं तोहि बहुत बुझायो । एतो मान सठ ! भयो मोहबस, जानतहु चाहत बिष खायो ॥ १ ॥ जगत-बिदित अति बीर बालि-बल जानत हौँ, किधौँ अब बिसरायो । बिनु प्रयास सोउ हत्यो एक सर, सरनागतपर प्रेम दिखायो ॥ २ ॥ पावहुगे निज करम-जनित फल, भले ठौर हठि बैर बढ़ायो । बानर-भालु चपेट चपेटनि मारत, तब ह्वैहै पछितायो ॥ ३ ॥ हौँ ही दसन तोरिबे लायक, कहा करौँ, जो न आयसु पायो । अब रघुबीर-बान-बिदलित उर सोवहिगो रनभूमि सुहायो ॥ ४ ॥ अबिचल राज बिभीषनको सब, जेहि रघुनाथ-चरन चित लायो । तुलसिदास यहि भांति बचन कहि गरजत चल्यो बालि-नृप-जायो
[अंगदजीने कहा—] 'रे दुष्ट ! सुन, मैंने तुझे बहुतेरा समझाया, परन्तु तू मोहवश ऐसे घमण्डमें भर गया है कि जानबूझकर विष खाना चाहता है ॥ १ ॥ जगतप्रसिद्ध महान् वीर बालिका बल तो तू जानता है न, या अब भूल गया ? देख, उसे रघुनाथजीने अनायास एक बाणसे ही मार डाला और अपने शरणागत सुग्रीवपर प्रेम दिखलाया ॥२॥ तुम भी अपने कर्मोंका फल भोगोगे तुमने आग्रह- पूर्वक अच्छी जगह बैर बढ़ाया है ! अब, जिस समय रीछ और वानर तुम्हें चपेटमें लेकर मारेंगे उस समय पश्चात्ताप होगा ॥ ३ ॥ तुम्हारे दाँत तोड़नेके लिये तो मैं ही पर्याप्त हूँ; परंतु करूँ क्या, इसके लिये मैंने प्रभुकी आज्ञा प्राप्त नहीं की है । अब तुम शीघ्र ही रामचन्द्रजीके बाणोंसे छिन्नहृदय होकर सुन्दर युद्धस्थलमें सोओगे ॥४॥ तुम्हारा यह अविचल राज्य तो सारा-का-सारा विभीषणको ही मिलेगा ।