भारतकोश
गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

पृष्ठ 362, कुल 454 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 362

गीतावली ३५६ सुर, नर, असुर, नाग, खग, किंनर—सकल करत मेरो मन भायो । निसिचर रुचिर अहार मनुज-तनु, ताको जस खल ! मोहि सुनायो कहा भयो, बानर सहाय मिलि, करि उपाय जो सिंधु बँधायो । धो तरिहै भुज बीस घोर निधि, ऐसौ को त्रिभुवनमें जायो ? ॥४॥ सुनि दससीस-बचन कपि-कुंजर बिहँसि ईसमायहि सिर नायो । तुलसिदास लंकेस कालबस गनत न कोटि जतन समझायो ॥ ५ ॥ [रावण बोला—] 'अरे कुटिल और ढीठ वानर ! तूने मेरा प्रभाव कुछ भी नहीं समझा। रे पामर पशु ! इसीलिये तू मुझे दास- के समान डांटनेके लिये आया है ॥ १ ॥ तू जानता नहीं—मेरा भाई शत्रुओंका नाश करनेवाला कुम्भकर्ण है और पुत्र साक्षात् देवराजको भी बंदी बना लाया था। मैं अपने अतुलित बाहुबलका तो वर्णन ही क्या करूँ, जिसने कैलासको गेंदके समान उठा लिया था ॥ २ ॥ देवता, मनुष्य, राक्षस, नाग, पक्षी और किन्नर—ये सब मेरी इच्छाका अनुवर्तन करते हैं। अरे दुष्ट ! मनुष्योंका शरीर तो राक्षसोंका प्रिय भोजन है। तू मुझे उसका सुयश सुनाने चला है ! ॥ ३ ॥ यदि वानरोंकी सहायता लेकर वह यत्न करके समुद्रको पार भी कर आया तो कौन बड़ी बात हो गयी ? किन्तु जो मेरी बीस भुजारूप घोर समुद्रको पार कर सके ऐसा त्रिलोकीमें कौन उत्पन्न हुआ है ?' ॥ ४ ॥ रावणके ये वचन सुन कपि-केसरी अंगदने ईश्वरकी मायाको सिर नवाया। तुलसीदासजी कहते हैं, अंगदजीने रावणको करोड़ों उपाय करके समझाया, परंतु कालके अधीन होनेके कारण उसने कुछ भी ध्यान नहीं दिया ॥ ५ ॥