गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
पृष्ठ 361, कुल 454 में से
संदर्भ में पढ़ें३५५ लंकाकाण्ड जद्यपि अंगद नोति परम हित कह्यो, तथापि न कछु मन भायो । तुलसीदास सुनि बचन क्रोध अति, पावक जरत मनहु घृत नायो ५ [अंगदजी बोले—] 'रावण ! तुम अच्छे कुलमें उत्पन्न हुए हो । तिसपर भी श्रीमहादेवजीकी पूजा, ब्रह्माजीके वरदान और अपने विपुल बाहुबलसे तुमने जगत्में सुयश प्राप्त किया है ॥ १ ॥ जिन्होंने खर, दूषण, त्रिशिरा, कबन्ध और बालि शत्रुओंको यमलोक भेज दिया है, मैं उन्हींका दूत हूँ और तुम्हें पवित्रचरित्र श्रीहरिका सन्देश सुनानेके लिये आया हूँ ॥ २ ॥ तुम ऐश्वर्यके अभिमान, राजपद अथवा मोहके अधीन होकर जानकर या बिना जाने किसी प्रकार जानकीको हर लाये हो, अब उन्हें रघुनाथजीको लौटा दो और कपट त्यागकर उन करुणामय प्रभुका भजन करो— इतनी हमारी शिक्षा मान लो ॥ ३ ॥ जिससे तुम्हारा हित हो और तुम्हारा कुल सकुशल रहे तथा राज्य अविचल होकर किसीका टाला न टले । नहीं तो, हे मूढ़ ! तुम रामचन्द्रजीके प्रतापरूप अग्निमें पतंग होकर दौड़-दौड़कर गिरोगे' ॥ ४ ॥ इस प्रकार यद्यपि अंगद- जीने यह परम हितकारी नीति कही, तथापि रावणको यह कुछ भी अच्छी न लगी । तुलसीदासजी कहते हैं, ये वचन सुनकर उसे बड़ा ही क्रोध हुआ, मानो जलती हुई अग्निमें घृत डाल दिया गया हो ॥५॥ [ ३ ] तैं मेरो मरम कछू नहिं पायो । रे कपि कुटिल ढीठ पसु पाँवर ! मोहि दास-ज्यों डाटन आयो ॥१॥ भ्राता कुंभकरन रिपुघातक, सुत सुरपतिहि बंदि करि ल्यायो । निज भुजबल अति अतुल कहौं क्यों, कंदुक ज्यों कैलास उठायो ॥ २ ॥