भारतकोश
गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

पृष्ठ 360, कुल 454 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 360

गीतावली ३५४ जिनके छोटे भाईकी खींची हुई रेखाको तुम विश्वविजयी होकर भी नहीं लाँघ सके, जिनके एक दूतने समुद्रको पार कर सारे नगरको उलट-पलटकर खूब अच्छी तरह जला दिया ॥ ६ ॥ तथा श्रुति और शेषजी जिनका 'कृपासिन्धु और दुष्टोंके वनके लिये अग्निके समान' ऐसा कहकर सुयश गाते हैं, हे नाथ ! अपने हृदयमें समझकर देख लो, ये यशस्वी वीर वे ही कोशलाधिपति भगवान् राम हैं ॥ ७ ॥ आप इस प्रकार आग्रह करके पुलस्त्य मुनिके यशरूप चन्द्रमामें कंलकरूप क्यों होते हैं ? मैंने संसारको ढूँढ़कर अच्छी तरह देख लिया है, अब और किसी प्रकारसे आपका उद्धार नहीं हो सकता ॥ ८ ॥ अतः अब मुझे आगेकर सीताजीको आदरसहित साथ ले, शीघ्र ही चलकर रघुनाथजीसे मिलिये—इसीमें आपकी कुशल है। आपके मुखसे 'शरण' शब्द सुनते ही प्रभु आपको निर्भय कर देंगे' ॥ ९ ॥ अंगदका दूतकर्म राग कान्हरा [ २ ] तू दसकंठ भले कुल जायो । ता महँ सिव,सेवा, बिरचि-बर, भुजबल बिपुल जगत जस पायो १ खर-दूषन-त्रिसिरा, कबंध रिपु जेहि बाली जमलोक पठायो । ताको दूत पुनीत चरित हरि सुभ संदेस कहन हौं आयो ॥ २ ॥ श्रीमद नृप अभिमान मोहबस, जानत अन जानत हरि लायो ! तजि व्यलीक भजु कारुनीक प्रभु, दैजानकिहि सुनहि समझायो । ३ । जातें तब हित होइ, कुसल कुल. अचल राज चलिहै न चलायो । नाहित रामप्रताप अनलमहँ ह्वै पतंग परि है सठ धायो ॥ ४ ॥