गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३५३ लंकाकाण्ड एकहि बान बालि मारयो जेहि, जो बल उदधि अगाधु । कहु, धौं कंत कुसल बीती केहि कये राम अपराघु ॥ ५ ॥ लांघि न सके लोक विजयी तुम जासु अनुज-कृत-रेषु । उतरि सिंधु जारयो प्रचारि पुर जाको दूत बिसेषु ॥ ६ ॥ कृपासिंधु, खल बन कृसानु सम, जस गावत श्रुति सेषु । सोई बिरुदंत बीर कौसलपति, नाथ ! समुझि जिय देषु ॥ ७ ॥ मुनि पुलस्त्यके जस-मयंक महँ कत कलंक हठि होहि । और प्रकार उबार नहीं कहुँ, मैं देख्यो जग जोहि ॥ ८ ॥ चलु, मिलु बेगु कुसल सादर सिय सहित अग्र करि मोहि । तुलसीदास प्रभु सरन सबद सुनि अभय करेंगे तोहि ॥ ६ ॥ [मन्दोदरी कहती है—] 'प्रियतम ! आप आज भी मेरी सीख मानिये और अपना क्रोध छोड़ दीजिये । भला, आप ही बतलाइये, रघुनाथजीसे विरोध करके कब किसका पूरा पड़ा है ? ॥ १ ॥ जिन्होंने बाल्यावस्थामें ही ताड़का और सुबाहुको मारकर यज्ञकी रक्षा करके अपने प्रभावको प्रकट किया तथा खेलहीमें पापी मारीचके मिससे अपने बाणका प्रताप दिखलाया ॥ २ ॥ फिर समस्त राजाओंके बल-सम्बन्धी अभिमानके सहित शिवजीके कठोर धनुषको तोड़ा और इस प्रकार सम्पूर्ण संसारको जीतकर जानकीसे विवाह किया तथा परशुरामजीका दर्प दूर किया ॥ ३ ॥ जिन्होंने कपट-काक जयन्तको दण्ड दे फिर [शरण आनेपर] उसपर कृपा की, अनायास ही विराधका वध किया तथा खर, दूषण, त्रिशिरा और कबन्धको मारकर देवता और साधुओंको सुखी किया ॥ ४ ॥ फिर जो बलका अगाध समुद्र था उस बालिका एक ही बाणमें वध किया, हे कान्त ! कहो तो उन रामका अपराध करनेपर किसकी कुशल हुई है ? ॥५॥ गी० २३—