भारतकोश
संग्रह पर लौटें

गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

गीतावली ३५८ जिसने रघुनाथजीके चरणोंमें चित्त लगाया है।' तुलसीदासजी कहते हैं, रावणसे ऐसे वचन कह वानरराज बालिके पुत्र अंगदजी गरजते हुए वहांसे चल दिये ॥ ५ ॥ लक्ष्मण-मूर्च्छा राग केदारा [ ५ ] राम-लषन उर लाय लये हैं। भरे नीर राजीव-नयन सब अँग परिताप तए हैं॥ १ ॥ कहत ससोक बिलोकि बंधु-मुख बचन प्रीति गुथए हैं। सेवक-सखा भगति-भायप-गुन चाहत अब अथए हैं॥ २ ॥ निज कीरति-करतूति तात ! तुम सुकृतौ सफल जए हैं। मैं तुम्ह बिनु तनु राखि लोक अपने अपलोक लए हैं॥ ३ ॥ मेरे पनकी लाज इहाँलों हठि प्रिय प्रान दए हैं। लागति सांगि बिभीषन ही पर, सीपर आपु भए हैं॥ ४ ॥ सुनि प्रभु-बचन भालु-कपि-गन, सुर सोच सुखाइ गए हैं। तुलसी आइ पवनसुत-बिधि मानो फिरि निरमये नए हैं॥ ५ ॥ [जिस समय मेघनादकी शक्ति खाकर लक्ष्मणजी मूर्च्छित हो गये और हनुमान्जी उन्हें भगवान् रामके पास ले आये, उस समय] रघुनाथजीने लक्ष्मणजीको उठाकर हृदयसे लगा लिया। उनके नेत्र- कमल जलसे भर आये और सब अङ्ग परितापसे संतप्त हो गये ॥ १ ॥ वे भाईका मुख देखकर अत्यन्त शोकयुक्त हो ये प्रीतिग्रथित वचन कहने लगे—'अब सेवक, सखा, भक्ति भ्रातृत्वके सारे गुण अस्त होनेवाले हैं ॥ २ ॥ हे तात ! अपनी कीर्ति और कृतिसे तुमने समस्त

३५६ लंकाकाण्ड सुकृतियोंको जीत लिया। अब तुम्हारे बिना इस शरीरको रखकर मैंने लोकमें अपकीर्ति ही कमायी है॥ ३॥ अहो! मेरी प्रतिज्ञाकी तुम्हे यहां तक लाज है कि उसके लिये अपने प्रिय प्राणतक दे डाले हैं; इसीलिये यद्यपि शक्ति तो विभीषणके हृदयपर लगनेवाली थी, परंतु उसकी रक्षा करने लिये तुम उसकी ढाल बन गये!'॥ ४॥ प्रभुके ये वचन सुनकर रीछ, वानर और देवतागण शोकसे सूख गये। तुलसीदासजी कहते हैं, इसी समय ब्रह्मारूप हनुमान्जीने [ओषधिके सहित आकर] मानो उन्हें फिरसे नया बना दिया ॥ ५॥ राग सोरठा [६] मोपै तो न कछू ह्वै आई। ओर निबाहि भली बिधि भायप चल्यो लखन-सो भाई ॥ १ ॥ पुर, पितु-मातु, सकल सुख परिहरि जेहि बन-बिपति बँटाई। ता सँग हौं सुरलोक सोक तजि सक्यो न प्रान पठाई ॥ २ ॥ जानत हौं या उर कठोरतें कुलिस कठिनता पाई। सुमिरि सनेह सुमित्रा-सुतको दरकि दरार न जाई ॥ ३ ॥ तात-मरन, तिय-हरन, गीध-बध, भुज दाहिनी गवाई। तुलसी मैं सब भांति आपने कुलहि कालिमा लाई ॥ ४ ॥ 'हाय! मुझसे तो कुछ भी नहीं बना! आज लक्ष्मण-जैसा भाई भ्रातृत्वका अन्ततक अच्छी तरह निर्वाह करके चला गया ॥ १ ॥ जिसने नगर, पिता, माता और सब प्रकारके सुखत्यागकर मेरी वनकी विपत्तिको बँटाया था, उसके साथ मैं अपने प्राणोंको भी शोक त्याग- कर सुरलोक नहीं भेज सका! ॥ २॥ मालूम होता है, वज्रने भी

मेरे इस कठोर हृदयसे ही कठिनता प्राप्त की है, इसीसे सुमित्रा- नन्दनके स्नेहका स्मरण करके इसमें फटकर कोई दरार नहीं पड़ी ॥ ३ ॥ हाय ! मेरे कारण ही पिताजीकी मृत्यु हुई, स्त्रीका अपहरण हुआ, गृध्रराजके प्राण गये और अब मुझे यह दाहिनी भुजा (लक्ष्मण) भी गँवानी पड़ी । इस प्रकार मैंने सब तरह अपने कुलको कलंक ही लगाया है ॥ ४ ॥

[ ७ ]

मेरो सब पुरुषारथ थाको । बिपति बँटावन बंधु-बाहु बिनु करौं भरोसो काको ॥ १ ॥ सुनु, सुग्रीव ! सांचेहू मोपर फेक्यो बदन बिधाता । ऐसे समय समर-संकट हौं तज्यो लखन-सो भ्राता ॥ २ ॥ गिरि, कानन जैहैं साखा-मृग, हौं पुनि अनुज-सँघाती । ह्वै है कहा बिभीषनकी गति रही सोच भरि छाती ॥ ३ ॥ तुलसी सुनि प्रभु-बचन भालु-कपि सकल बिकल हिय हारे । जामवंत हनुमंत बोलि तब, औसर जानि प्रचारे ॥ ४ ॥

‘अब मेरा सारा पुरुषार्थ थक गया । अपनी विपत्तिको बँटाने- वाले भाईरूप भुजाके बिना अब मैं किसका भरोसा करूँ ? ॥ १ ॥ सुग्रीव ! सुनो, विधाताने सचमुच मेरी ओरसे मुंह फेर रखा है, इसीसे ऐसे समय युद्धका संकट उपस्थित होनेपर मुझे लक्ष्मण-जैसे भाईने त्यागदिया ॥२॥ बानर तो पर्वत और वनोंमें चले जायँगे और मैं भैया लक्ष्मणका साथ पकडूंगा, परंतु मेरे हृदयमें यही सोच भरा हुआ है कि विभीषणकी क्या गति होगी’ ॥ ३ ॥ तुलसीदासजी कहते हैं, प्रभुके ये वचन सुनकर सब रीछ-वानर हृदयमें व्याकुल

३६१ लंकाकाण्ड होकर थकित हो गये। तब जाम्बवान्‌ने हनुमान्‌जीको बुलाकर उत्तेजित किया ॥ ४ ॥ राग मारू [ ८ ] जौ हौं अब अनुसासन पावौं। तौ चंद्रमहि निचोरि चैल-ज्यौं, आनि सुधा सिर नावौं ॥ १ ॥ कै पाताल दलौं ब्यालावलि अमृत-कुण्ड महि लावौं। भेदि भुवन, करि भानु बाहिरो तुरत राहु दं तावौं ॥ २ ॥ बिबुध-बैद बरबस आनौं धरि, तौ प्रभु-अनुज कहावौं। पटकौं मीच नीच मूषक-ज्यौं, सबहिको पापु बहावौं ॥ ३ ॥ तुम्हरिहि कृपा, प्रताप तिहारेहि नेकु बिलंब न लावौं। दीजै सोइ आयसु तुलसी-प्रभु, जेहि तुम्हरे मन भावौं ॥ ४ ॥ [तब हनुमान्‌जी कहने लगे—] 'प्रभो ! यदि इस समय मुझे आज्ञा मिले तो मैं चन्द्रमाको वस्त्रके समान निचोड़कर उससे अमृत लाकर ही आपको सिर नवाऊँ ॥ १ ॥ अथवा पातालमें [अमृतकी रक्षा करनेवाले] सर्पोंको मारकर अमृत-कुण्डको भूमिपर उठा लाऊँ [यदि उससे भी काम न चले तो] भुवनकोशको फोड़कर सूर्यको बाहर निकाल दूँ और तुरंत ही उस छिद्रपर राहुको रखकर उसे मूँद दूँ [जिससे फिर सूर्य न आ सके और प्रातःकाल न हो] ॥ २ ॥ यही नहीं, यदि मैं देवताओंके वैद्य अश्विनीकुमारोंको बलपूर्वक ले आऊँ, तभी प्रभुका अनुचर कहलाऊँ । नीच मृत्युको मूषकके समान पटक दूँ और इस प्रकार सभीका पाप काट दूँ [फिर किसीको मरनेका ही भय न रहे] ॥ ३ ॥ प्रभो ! आपकी

गीतावली ३६२ कृपा और आपहीके प्रतापसे मैं इन कार्योंमें तनिक भी देरी नहीं करूँगा। अतः हे तुलसीदासके स्वामी ! जिसके करनेसे मैं तुमको प्रिय लगूँ, वही आज्ञा दीजिये ॥ ४ ॥ [ ९ ] सुनि हनुमंत-बचन रघुबीर। सत्य, समीर-सुवन ! सब लायक, कह्यो राम धरि धीर ॥ १ ॥ चहिये बैद, ईस-आयसु धरि सीस कीस बलऐन। आन्यो सदनसहित सोवत ही, जौलौं पलक परै न ॥ २ ॥ जियै कुँवर, निसि मिले मूलिका, कीन्हीं बिनय सुषेन। उठ्यो कपीस, सुमिरि सीतापति, चल्यो सजीवनि लेन ॥ ३ ॥ कालनेमि दलि बेगि बिलोक्यो द्रोनाचल जिय जानि। देखी दिब्य ओषधी जहँ तहँ जरी, बेग न परि पहिचानि ॥ ४ ॥ लियो उठाय कुधर कंदुक-ज्यों, बेग न जाइ बखानि। ज्यों धाए गजराज-उधारन सपदि सुदरसनपानि ॥ ५ ॥ आनि पहार जोहारे प्रभु, कियो बेदराज उपचार। करुनासिंधु बंधु भेट्यो, मिटि गयो सकल दुख-भार ॥ ६ ॥ मुदित भालु-कपि-कटक, लह्यो कनु समर पयोनिधि पार। बहुरि ठौरही राखि महीधर आयो पवनकुमार ॥ ७ ॥ सेन सहित सेवकहि सराहत पुनि पुनि राम सुजान। बरषि सुमन, हिय हरषि प्रसंसत बिबुध बजाइ निसान ॥ ८ ॥ तुलसिदास सुधि पाइ निसाचर भए मनहु बिनु प्रान। परी भोरही रोर लंकगढ़, दई हाँक हनुमान ॥ ९ ॥ हनुमान्जीके ये वचन सुनकर रघुश्रेष्ठ भगवान् रामने धैर्य धारणकर कहा—'पवनन्दन ! तुम्हारा कथन सर्वथा सत्य है,

३६३ लंकाकाण्ड तुम वास्तवमें यह सभी कुछ करनेमें समर्थ हो ॥ १ इस समय एक वैद्यकी आवश्यकता है। भगवान्‌की यह आज्ञा सिरपर रखकर बलशाली वानरराज, जितनी देरमें पलक भी न लगे इतनेहीमें एक वैद्यको उसके घरसहित सोते हुए ही उठा लाये ॥ २ ॥ उस सुषेण नामक वैद्यने विनयपूर्वक कहा—'यदि रात्रिके भीतर ही संजीवनी बूटी मिल सके तो कुंवर जीवित हो सकते हैं।' यह सुनते ही वानरेश्वर हनुमान्‌जी सीतापति भगवान् रामका स्मरण करते हुए उठे और संजीवनी बूटी लेनेके लिये चल दिये ॥ ३ ॥ उन्होंने मार्गमें कालनेमिको मारकर शीघ्र ही द्रोणाचलको देखा और उसे अपने चित्तसे ही पहचान लिया। वहाँ उन्होंने जहाँ-तहाँ बहुत-सी दिव्य ओषधियाँ देखीं; परंतु वे उस बूटीको न पहचान सके ॥ ४ ॥ तब उन्होंने उस पर्वतको गेंदके समान उठा लिया। उस समयके उनके वेगका वर्णन नहीं किया जा सकता। ऐसा जान पड़ता था, मानो गजराजका उद्धार करनेके लिये बड़ी शीघ्रतासे चक्रपाणि भगवान् विष्णु दौड़े जा रहे हों ॥ ५ ॥ इस प्रकार पहाड़को लाकर उन्होंने प्रभुको प्रणाम किया और वैद्यराजने लक्ष्मणजीकी चिकित्सा की [ इससे लक्ष्मणजी तत्काल सचेत हो गये]। तब करुणासागरभगवान्‌रामने भाईका आलिंगन किया और इससे उनके दुःखका सारा भार मिट गया ॥ ६ ॥ रीछ और वानरोंका दल भी ऐसा आनन्दित हुआ, मानो उसे संग्रामरूप समुद्रका पार मिल गया हो। तत्पश्चात्, हनुमान्‌जी उस पर्वतको जहाँ-का-तहाँ रख आये ॥ ७ ॥ उस समय सम्पूर्ण सेनाके सहित परम चतुर भगवान् राम बारंबार अपने सेवककी प्रशंसा करने लगे तथा देवतालोग भी

गीतावली ३६४ पुष्पोंकी वर्षा कर, हृदयमें आनन्दित हो दुन्दुभी बजाते हुए उनकी बड़ाई करने लगे ॥ ८ ॥ तुलसीदास कहते हैं, इस समाचारको पाकर राक्षसगण तो मानो प्राणहीन हो गये । प्रातःकाल होते ही जब हनुमान्जीने हाँक लगायी तो लंकापुरीमें हाहाकार मच गया ॥ ९ ॥ राग केदारा [ १० ] कौतुक ही कपि कुधर लियो है। चल्यो नभ नाइ माथ रघुनाथहि, सरिस न बेग बियो है ॥ १ ॥ देख्यो जात जानि निसिचर, बिनु फर सर हन्यो हियो है। परचो कहि राम, पवन राख्यो गिरि, पुर तेहि तेज पियो है ॥ २ ॥ जाइ भरत भरि अंक भेंटि निज, जांवन दान दियो है। दुख लघु लषन मरम घायल सुनि, सुख बड़ो कीस जियो है ॥ ३ ॥ आयसु इतहि, स्वामि संकट उत, परत न कछू कियो है। तुलसिदास बिदरचो अकास, सो कैसेंकें जात सियो है ॥ ४ ॥ [अब पर्वत लाते समय मार्गमें जो घटना हुई उसका वर्णन करते हैं—] हनुमान्जीने खेलसे ही पर्वत उठा लिया और रघुनाथ- जीको सिर नवा आकाशमार्गसे चल दिये । उस समय उनके समान और किसीका वेग नहीं था ॥ १ ॥ उन्हें [अयोध्याके ऊपर होकर ] जाते देख भरतजीने राक्षस जानकर उनके हृदयमें बिना गाँसीका बाण मारा । तब वे 'राम' ऐसा कहते हुए गिर पड़े । पवनने [अयोध्याकी रक्षा करनेके लिये] पर्वतको रोक लिया, मानो नगरने उनका तेज पी लिया हो ॥ २ ॥ तब भरतजीने

३६५ लंकाकाण्ड [उनके मुखसे रामनाम सुन] उनके समीप जा अपनी भुजाओंमें भरकरउनका आलिङ्गनकिया और उन्हें जीवनदान दिया। लक्ष्मणजी मर्माहत हुए हैं—यह सुनकर तो उन्हें थोड़ा-सा दुःख हुआ, परंतु हनूमान्‌जीको जीवित देखकर वे परम आनन्दित हुए ॥ ३ ॥ स्वामीकी आज्ञा इधर आयोध्यामें ही रहनेकी है और उधर उनपर युद्धका संकट पड़ा हुआ है—इसपर भरतजीने बहुत कुछ विचार किया, परंतु उनसे कुछ करते न बना। तुलसीदासजी कहते हैं, [भरतजीकी अवस्था उस समय ऐसी थी] जैसे आकाश फट जाय तो उसे कैसे सिया जाय ? ॥ ४ ॥ [ ११ ] भरत-सत्रुसूदन बिलोकी कपि चकित भयो है। राम-लषन रन जीति अवध आए, कैधौं मोहि भ्रम, कैधौं काहू कपट ठयो है॥ १ ॥ प्रेम पुलकि, पहिचानिकैं पदपदुम नयो है। कह्यो न परत जेहि भांति दुहु भाइन सनेहसों उर लाय लयो है॥ २ ॥ समाचार कह गहरु भो, तेहि ताप तयो है। कुधर सहित चढ़ौ बिसिख, बेगि, पठवौं, सुनि हरि हिय गरब गूढ़ उपयो है॥ ३ ॥ तीरतें उतरि जस कह्यो चहैं, गुनगननि जयो है। धनि भरत ! धनि भरत ! करत भयो, मगन मौन रह्यो मन अनुराग रयो है॥ ४ ॥ यह जलनिधि खन्यो, मथ्यो, लँघ्यो,बांध्यो,अँचयो है। तुलसिदास रघुबीर बंधु-महिमाको सिंधु तरि को कसि पार गयो है ? ॥ ५ ॥

गीतावली ३६६ हनूमान्‌जी भरत और शत्रुघ्नको देखकर बड़े विस्मित हुए । वे सोचने लगे—क्या राम और लक्ष्मण युद्धमें विजय प्राप्तकर अयोध्यामेंआ गये हैं या मुझे भ्रम होरहा है ? अथवा यहकिसीने कपट किया है ॥१॥ फिर उन्हें पहचानकर उन्होंने प्रेमसे पुलकित हो उनके चरणकमलोंमें प्रणाम किया । उस समय उन्हें दोनों भाइयोंने जैसे प्रेमसे हृदयसे लगाया, वह कहा नहीं जाता ॥ २ ॥ फिर उन्हें सारे समाचार सुनाकर कहा—'मुझे विलम्ब हो रहा है।' वे सब बातें सुनकर भरतजी दुःखसे संतप्त हो गये और बोले—'तुम पर्वतसहित मेरे बाणपर चढ़ जाओ, मैं तुरन्त ही तुम्हें रघुनाथजीके प'स भेज दूंगा !' यह सुनकर हनुमान्‌जीके हृदयमें गुप्तरूपसे गर्वका आविर्भाव हुआ ॥ ३ ॥ [वे उनके बाणपर चढ़े और जब देखा कि उनके लिये यह कोई बड़ी बात नहीं है । ] तो उससे उतरकर उनका सुयश कहना चाहा । भरतजीके गुणोंने उन्हें जीतलिया । उनकामन अनुराग- में डूब गया तथा 'भरतजी धन्य हैं, भरतजी धन्य हैं, इस प्रकार कहते हुए प्रेममें मग्न होकर वे चुप रह गये ॥४॥ तुलसीदासजी कहते हैं, इस समुद्रको तो [सगर-पुत्रोंने] खोदा है, [देवता और दैत्योंने] मथा है, [हनूमान्‌जीने] लांघा है, [नल-नीलने बांधा है और [अस्त्यजीने] पिया है; किन्तु रघुनाथजीके भाई भरतजीकी महिमाके समुद्रको तरकर भला कौन कवि पार गया है ? ॥ ५ ॥ [ १२ ] होतो नहि जौ जग जनम भरतको । तौ, कपि कहत, कृपान-धार मग चलि आचरत बरत को ? ॥ १ ॥

३६७ लंकाकाण्ड धीरज-धरम धरनिधर-धुरहूँतें गुर धुर धरनि धरत को ? सब सदगुन सन्मानि आनि उर, अघ-ओगुन निदरत को ? ॥ २ ॥ सिवहु न सुगम सनेह रामपद सुजननि सुलभ करत को ? सृजि निज जस-सुरतरु तुलसीकहँ, अभिमतफरनि फरतको ? ॥ ३ ॥ हनूमान्‌जी कहने लगे—यदि संसारमें भरतजीका जन्म न हुआ होता तो खाँड़की धाररूप इस दुर्गम मार्गमें चलकर प्रेमव्रतका कौन आचरण करता ? ॥ १ ॥ पृथिवीमें पर्वतोंके भारसे भी भारी धैर्य और धर्मका बोझा कौन उठाता ? सब सद्‌गुणोंको सम्मानपूर्वक हृदयमें धारण कर कौन पाप और अवगुणोंका निरादर करता ? ॥ २ ॥ और जो श्रीरामचन्द्रजीके चरणोंका प्रेम शिवजीको भी सुलभ नहीं है, उसे कौन सत्पुरुषोंके लिये सुलभ करता तथा अपने सुयशरूप कल्पवृक्षको रचकर कौन तुलसीदासके लिये अभिमत फल उत्पन्न करता ? ॥ ३ ॥ [ १६ ] सुनि रन घायल लषन परे हैं। स्वामिकाज संग्राम सुभटसों लोहे ललकारि लरे हैं॥ १ ॥ सुवन-सोक, संतोष सुमित्रहि, रघुपति-भगति बरे हैं। छिन-छिन गात सुखात, छिनहिं छिन हुलसत होत हरे हैं॥ २ ॥ कपिसों कहति सुभाय, अँबके अंबक अंबु भरे हैं। रघुनंदन बिनु बंधु कुअवसर, जुद्यपि धनु दुसरे हैं॥ ३ ॥ 'तात ! जाहु कपि संग', रिपुसूवन उठिकर जोरि खरे हैं। प्रमुदित पुलकि पेंत पूरे जनु बिधिबस सुढर ढरे हैं॥ ४ ॥ अंब-अनुजगति लखि पवनज-भरतादि गलानि गरे हैं। तुलसी सब समुझाय मातु तेहिं समय सचेत करे हैं॥ ५ ॥

गीतावली ३६८ जब सुमित्राने सुना कि लक्ष्मणजी युद्धस्थलमें घायल पड़े हैं और उन्होंने अपने स्वामीके लिये विपक्षी योद्धा मेघनादसे रणभूमिमें खूब ललकारकर लोहा भिड़ाया है ॥ १ ॥ तो उन्हें पुत्रकी दशासे तो शोक हुआ और इस बातसे संतोष हुआ कि उन्होंने रघुनाथजी- की भक्तिको स्वीकार किया । उनके अङ्ग एक क्षणमें शोकमें सूख जाते हैं और फिर दूसरे ही क्षणमें आनन्दसे हरे हो जाते हैं ॥ २ ॥ तब माता सुमित्राने नेत्रोंमें जल भरकर, स्वभावसे ही हनूमान्‌जीसे कहा—'रामजी कुअवसरमें भाईसे बिछुड़ गये, यद्यपि धनुष उनके साथ है [जिसके होते हुए उन्हें अन्य किसीकी सहायताकी अपेक्षा नहीं है]' ॥ ३ ॥ [हनूमान्‌जीसे ऐसा कहकर वे शत्रुघ्नजीसे बोली—] 'भैया ! तुम इस हनूमान्‌के साथ जाओ ।' यह सुनते ही शत्रुघ्नजी हाथ जोड़कर खड़े हो गये और शरीरमें पुलकायमान होकर ऐसे प्रसन्न हुए मानो दैवयोगसे उनके पूरे-पूरे दाँव पड़ गये हों ॥ ४ ॥ माता और छोटे भाईकी यह दशा देखकर हनूमान् और भरतजी बड़े ही ग्लानिग्रस्त हो गये । तुलसीदासजी कहते हैं तब माताने उन सबको समझाकर सचेत किया ॥ ५ ॥ [ १४ ] बिनय सुनयनी परि पाय । कहाँ कहा, कपीस ! तुम्ह सुचि, सुमति, सुहृद सुभाय ॥ १ ॥ स्वामि-संकट-हेतु हौं जड़ जननि जनम्यो जाय । समौ पाइ, कहाइ सेवक घट्यो तौ न सहाय ॥ २ ॥ कहत सिथिल सनेह भो, जनु घोर घायल घाय । भरत-गति लखि मातु सब रहि ज्यौं गुड़ी बिनु बाय ॥ ३ ॥

३६६ लंकाकाण्ड भेंट कहि कहिबो, कह्यो यों कठिन-मानस माय । 'लाल ! लोने लषन-सहित सुललित लागत नाँय' ॥ ४ ॥ देखि बंधु-सनेह, अंब सुभाउ, लषन-कुठाय । तपत तुलसी तरनि-त्रासकु एहि नये तिहुँ ताय ॥ ५ ॥ [ भरतजी कहने लगे— ] 'तुम भगवान् रामके पैरों पड़कर मेरी एक विनय सुनाना। हे कपीश्वर ! तुमसे मैं अधिक क्या कहूँ। तुम तो स्वभावसे ही शुद्धचित्त, सुमति और सुहृद् हो ॥ १ ॥ मुझ मूढ़को मेरी माताने प्रभुको कष्ट पहुँचाने के लिये व्यर्थ ही जन्म दिया है, क्योंकि मैं उनका सेवक कहलाकर भी समय उपस्थित होनेपर उनकी सहायता न कर सका' ॥ २ ॥ इस प्रकार कहते-कहते वे स्नेहसे शिथिल हो गये, जैसे कोई धीर पुरुष घावसे घायल हो जानेपर हो जाता है। भरतजीकी यह दशा देखकर सब माताएं इस प्रकार रह गयीं जैसे वायुके बिना पतंग ॥ ३ ॥ [ कौसल्याजी बोलीं— ] भैया ! रामसे भेंट करके कहना कि तुम्हारी कठोरहृदया माताने कहा है—'हे लाल ! तुम्हारा नाम ललित लाल लक्ष्मणके सहित ही सुन्दर मालूम होता है [अतः तुम्हारी शोभा लक्ष्मणके साथ ही लौटनेमें है]' ॥ ४ ॥ तुलसीदासजी कहते हैं, इस प्रकार भाईका स्नेह, माताका स्वभाव और लक्ष्मणजीको मर्माहित देख सूर्यको भी त्रस्त करनेवाले हनूमान्‌जी इन तीनों नये तापोंसे तपने लगे ॥ ५ ॥ [ १५ ] हृदय घाउ मेरे पीर रघुबीरें । पाइ सजीवन, जागि कहत यों प्रेमपुलकि बिसराय सरीरें ॥ १ ॥ मोहि कहा बूझत पुनि पुनि, जैसे पाठ-अरथ-चरचा कीरें । सोभा-सुख, छति-लाहु नृपकहूँ, केवल कांति-मोल हीरें ॥ २ ॥ गी० २४

गीतावली ३७० तुलसी सुनि सौमित्रि-बचन सब धरि न सकत धीरौ धीरै । उपमा राम-लषनकी प्रीतिकी क्यों दीजै खीरै-नीरै ॥ ३ ॥ संजीवनी बूटी खाकर सचेत होनेपर [जब पीड़ा आदिके विषयमें पूछा गया तो ] लक्ष्मणजी ने प्रेमसे पुलकित हो शरीरानु- सन्धानको भूलकर कहा—'मेरे हृदयमें तो केवल घाव ही है, उसकी पीड़ा तो रघुनाथजीको है ॥ १ ॥ जैसे तोतेसे कोई उसके पाठके अर्थकी चर्चा करे, वैसे ही आप लोग बार-बार मुझसे क्या पूछते हैं; हीरेके द्वारा शोभा, सुख तथा हानि या लाभ—ये सब तो राजाको ही होते हैं, हीरेकी तो केवल कान्ति तथा कीमत ही होती है ॥ २ ॥ तुलसीदासजी कहते हैं, लक्ष्मणजी के ये वचन सुनकर बड़े-बड़े धीर भी धैर्य धारण नहीं कर सकते । उन राम और लक्ष्मणके प्रेमकी उपमा दूध और पानीसे भी कैसे दी जाय ? ॥ ३ ॥ विजयी राम राग कान्हरा [ १६ ] राजत राम काम सत-

३७१ लंकाकाण्ड अपने शत्रु रावणको युद्धस्थलमें जीतकर भगवान् राम भाईके साथ विराजमान हैं। इस समय वे सैकड़ों कामदेवोंसे भी सुन्दर जान पड़ते हैं और अपना करकमल धनुष और बाणपर फेर रहे हैं ॥ १॥ उनके श्याम शरीरपर पसीनेकी सुन्दर बूंदें और बीच-बीचमें मनोहर रुधिरकण शोभायमान हैं, मानो किसी मरकतमणिके पर्वत- शिखरपर जुगुनुओंके समूहमें बीरबहूटियाँ शोभा पा रही हों ॥ २ ॥ उनके चारों ओर घायल वीर बैठे हुए हैं। वे सम्पूर्ण रीछ-वानर बड़े ही प्रसन्न हैं। उस समय प्रभु ऐसे जान पड़ते हैं, मानों फूले हुए किंशुक वृक्षोंके बीचमें एक अति विशाल और तरुण तमालवृक्ष हो ॥ ३॥ उस समय कमलनयन भगवान् रामने कृपादृष्टिसे देखकर सब मुनि, नाग, देवता और मनुष्योंको निर्भय कर दिया। तुलसीदासजी कहते हैं, यह दुःसह विपत्तिको दूर करनेवाला अनुपम रूप हमारे हृदयकमलमें विराजमान रहे ॥ ४ ॥ अयोध्यामें प्रतीक्षा राग आसावरी [ १७ ] अवधि आजु किधौं औरो दिन द्वै हैं। चढ़ि धौरहर, बिलोकि दखिन दिसि, बूझ धौं पथिक कहाँते आये वै हैं ॥ १ ॥ बहुरि बिचारि हारि हिय सोचति, पुलकि गात लागे लोचन च्वैहैं। निज बासरनि बरष पुरवंगोबिघ, मेरे वहां कठिन कृत क्वैहैं बन रघुबीर, मातु गृह जीवति, निलज प्रान सुनि सुनि स्वैहैं। तुलसीदास मो-सी कठोर-चित कुलिस सालभंजनि की द्वै हैं ॥ २ ॥

गीतावली ३७२ [जब अवधिके दिन प्रायः बीत चुके तो माता कौसल्याको रामके मिलनेकी बड़ी ही लालसा हुई। उस समय वे कहती हैं—] ‘क्यों जी, अवधि आज ही पूरी होगी या उसका कोई और दिन आवेगा ?’ फिर अपने महलपर चढ़कर दक्षिणकी ओर देखती हुई कहती हैं, ‘देखो पूछो तो, वे पथिक कहाँसे आ रहे हैं ?’ ॥ १ ॥ फिर अवधिमें विलम्ब जान, हृदयमें हार मानकर शोकग्रस्त हो जाती हैं, उनका शरीर पुलकित हो जाता है, नेत्रोंसे जल बहने लगता है [और वे मन-ही-मन कहने लगती हैं—] मालूम होता है, हमने जो कुटिल कर्म किये हैं, उनके परिणाममें विधाता इन चौदह वर्षोंको अपने ही दिनोंके हिसाबसे पूरा करेगा ॥ २ ॥ ‘हाय ! राम वनमें हैं और उनकी माता घरमें रहकर जी रही हैं !’ अब ये निर्लज्ज प्राण इस लोकापवादको सुन-सुनकर सुखकी नींद सोवेंगे ! भला, मुझ-जैसी कठोरचित्त वज्रकी गढ़ी हुई मूर्ति कौन होगी ! ॥ ३ ॥ [ १८ ] आली, अब राम लषन कित ह्वैं हैं। चित्रकूट तज्यौ तबतें न लही सुधि, बधू-समेत कुसल सुत द्वैं हैं १ बारि बयारि, बिषम हिम-आतप सहि बिनु बसन भूमितल स्वैहैं। कंद-मूल, फल-फूल असन बन, भोजन समय मिलत कैसे वैहैं। २ । जिन्हहि बिलोकि सौंचिहैं लता-द्रुम-खग-मृग-मुनि लोचन जल च्वैहैं तुलसीदास तिन्हकी, जननि हौं, मो-सी निठुर-चित औरो कहुँ ह्वैहैं ३ ‘अरी सखि ! इस समय राम और लक्ष्मण किधर होंगे ? जबसे उन्होंने चित्रकूटको छोड़ा है तबसे उनका कोई समाचार नहीं मिला। क्या वधू सीताके सहित मेरे दोनों बालक सकुशल होंगे ? ॥ १ ॥

३७३ लंकाकाण्ड वे वर्षा, वायु तथा भीषण शीत और घाम सहते हुए बिना वस्त्रके ही पृथ्वीपर पड़े रहते होंगे । वनमें कन्द, मूल और फल-फूल आदि ही खानेको मिलते हैं, और वह भोजन भी उन्हें समयपर खानेको कैसे मिलता होगा ? ॥ २ ॥ जिन्हें देखकर लता और वृक्षादिको भी शोक होगा तथा पक्षी, मृग और मुनियोंके नेत्रोंसे जल चूने लगेगा, मैं उन्हींकी माता हूँ ! भला मुझ-जैसी निष्ठुरहृदया भी कोई कहीं होगी ?' ॥ ३ ॥ राग सोरठ [ १९ ] बैठी सगुन मनावति माता । कब ऐहैं मेरे बाल कुसल घर, कहहु, काग ! फुरि बाता ॥ १ ॥ दूध-भातकी दौनी दैहों, सोने चोंच मढ़ैहौं । जब सिय-सहित बिलोकि नयन भरि राम-लषन उर लैहौ ॥ २ ॥ अवधि समीप जानि जननी जिय अति आतुर अकुलानी । गनक बोलाइ, पाँय परि पूछति प्रेम मगन मृदु बानी ॥ ३ ॥ तेहि अवसर कोउ भरत निकटतें समाचार लै आयो । प्रभु-आगमन सुनत तुलसी मनो मीन मरत जल पायो ॥ ४ । माता बैठी-बैठी शकुन मनाती है—'अरे काक ! सच-सच बता, मेरे बालक कुशलपूर्वक कब घर आ जायेंगे ? ॥ १ ॥ जिस समय मैं नेत्र भरकर सीताके सहित राम और लक्ष्मणको देखकर हृदयसे लगाऊँगी, उस समय मैं तुझे दूध-भातका दोना दूँगी और तेरी चोंच सोनेसे मढ़वा दूँगी ॥ २ ॥ फिर वनवासी अवधिको समीप ही जान माता अत्यन्त आतुर होकर हृदयमें व्याकुल हो

गीतावली ३७४ जाती हैं और किसी ज्योतिषीको बुला, उसके पैरों पड़, प्रेममें मग्न होकर मधुर वाणीसे पूछती हैं ॥ ३ ॥ इसी समय भरतजीके पाससे कोई रघुनाथजीके आनेका समाचार लेकर आया । तुलसीदासजी कहते हैं, उसके मुखसे भगवान्‌का आगमन सुनते ही [कौसल्या- जीको ऐसी शान्ति मिली] मानो मरती हुई मछलीको जल मिल गया हो ॥ ४ ॥ राग गौरी [ २० ] क्षेमकरी ! बलि, बोलि सुबानी । कुसल क्षेम सिय-राम-लषन कब ऐहैं, अंब ! अवधरजधानी ॥ १ ॥ ससिमुखि, कुंकुम बरनि, सुलोचन, मोवनि सोचनि बेद बखानी । देवि ! दयाकरि देहि दरसफल, जोरि पानि बिनवहिं सब रानी ॥ २ ॥ सुनि सनेहमय बचन, निकट ह्वैं मंजुल मंडल कै मड़रानी । सुभ मंगल आनंद गगन-धुनि अकनि-अकनि उर-जरनि जुड़ानी ३ फरकन लगे सुअंग बिदिसि दिसि, मन प्रसन्न, दुख-दसा सिरानी । करहिं प्रनाम सप्रेम पुलकि तनु, मानि बिबिध बलि सगुन सयानी ॥४॥ तेहि अवसर हनुमान भरतसों कही सकल कल्यान-कहानी । तुलसीदास सोइ चाह सजीवनि बिषम बियोग व्यथा बड़ि भानी ॥५॥ 'अरी क्षेमकरी (लाल चील) ! मैं बलिहारी जाती हूँ। अरी मैया ! तू अपनी सुन्दर वाणीसे सच-सच बता कि सीता, राम और लक्ष्मण कुशल-क्षेमपूर्वक कब अपनी राजधानी अयोध्याको लौट आवेंगे ? ॥ १ ॥ हे देवि ! तू चन्द्रमाके समान मुखवाली, कुंकुमवर्णा और सुनयना है; वेदोंने तुझे सब प्रकारके शोकोंसे छुड़ानेवाली कहा है। तू दया करके हमें अपने दर्शनोंका

३७५ लंकाकाण्ड फल दे'—इस प्रकार सब रानियाँ हाथ जोड़कर प्रार्थना करती हैं ॥ २ ॥ उनके ये स्नेहपूर्ण वचन सुनकर वह चील उनके पास होकर सुन्दर मण्डल बाँधकर मँड़राने लगी । उस समय आकाश- में उसकी शुभ, आनन्द और मङ्गलमयी ध्वनि सुन-सुनकर उनके हृदयकी तपन शान्त हो गयी ॥ ३ ॥ दिशा-विदिशाओंमें सबके शुभ अङ्ग फड़कने लगे, मन प्रसन्न हो गये और दुःखमयी दशा का अन्त हो गया तथा कौसल्या आदि सुचतुर स्त्रियाँ तरह-तरहकी बलि और शकुन मनाती हुईं प्रेमसे पुलकितशरीर हो अपने इष्टदेवोंको प्रणाम करने लगीं ॥ ४ ॥ इसी समय हनुमान्‌जी ने भरतजीको सारा मंगल समाचार सुनाया । तुलसी- दासजी कहते हैं, उस [मंगल-समाचाररूप] अभीष्ट संजीवनी बूटीने उनकी अत्यन्त घोर वियोग-व्यथाको नष्ट कर दिया ॥ ५ ॥ अयोध्यामें आनंद राग धनाश्री [ २१ ] सुनियत सागर सेतु बँधायो । कौसलपतिकी कुसल सकल सुधि कोउ इक दूत भरत पहँ ल्यायो ।१। बध्यो बिराध, त्रिसिर, खर-दूषन सूर्पनखाको रूप नसायो । हति कबंध, बल-अंध बालि दलि, कृपासिंधु सुग्रीव बसायो ॥ २ ॥ सरनागत अपनाइ विभीषन, रावन सकुल समूल बहायो । बिबुध-समाज निवाजि, बाँह दै, बंदिछोर बर बिरद कहायो ॥ ३ ॥ एक-एकसों समाचार सुनि नगर लोग जहँ तहँ सब धायो । घन धुनि अकनि मुदित मयूर-ज्यों, बूड़त जलधि पार-सो पायो ॥४॥

गीतावली ३७६ 'अवधि आजु' यौँ कहत परसपर, बेगिबिमान निकट पुर आयो । उतरि अनुज-अनुगनि समेत प्रभु गुर-द्विजगन सिर नायो ॥ ५ ॥ जौ जेहि जोग राम तेहि बिधि मिलि, सबके मन अति मोद बढ़ायो । भेंटी मातु, भरत भरतानुज, क्यौं कहौं प्रेम अमित अनमायो । ६ । तेहि दिन मुनिबृन्द अनंदित तुरत तिलकको साज सजायो । महाराज रघुबंस नाथको सादर तुलसिदास गुन गायो ॥ ७ ॥ [भगवान्‌की वनमें की हुई लीलाओंको सुनकर नगरके लोग आपसमें कहने लगे—] क्यों जी, सुना जाता है रामचन्द्रजीने समुद्रका पुल बँधवाया था ? कोई एक दूत कोसलपति भगवान्‌ रामका सारा कुशल-समाचार भरतजीके पास लाया था ॥ १ ॥ कहते हैं, कृपासागर रामने विराध, खर, दूषण, और त्रिशिराका वध किया, शूर्पणखाको कुरूपा बना दिया तथा कबन्धको मारकर, बलसे अंधे हुए बालिका दमनकर सुग्रीवका घर बसा दिया ॥ २ ॥ फिर शरणमें आये हुए विभीषणको अपनाकर रावणको सकुटुम्ब समूल नष्ट कर दिया । इस प्रकार अपनी भुजाओंका आश्रय दे देवसमाज- की रक्षा कर अपना 'बंदिछोर' यह श्रेष्ठ सुयश प्रसिद्ध किया ॥ ३ ॥ इसी तरह एक-एकसे समाचार पा सब नागरिक जहाँ-तहाँ दौड़ने लगे, जैसे मेघकी ध्वनि सुनकर मयूर प्रसन्न हो जायें, अथवा समुद्रमें डूबते हुएको किनारा मिल जाय ॥ ४ ॥ 'वनवासकी अवधि आज ही है' इस प्रकार आपसमें कहते-कहते शीघ्र ही विमान नगरके निकट आ गया । उससे भाई लक्ष्मण और अपने अनुचरोंके सहित उतरकर प्रभुने गुरु तथा अन्य ब्राह्मणोंको सिर नवाया ॥ ५॥ जो जिस योग्य था उससे उसी प्रकार मिलकर रामचन्द्रजी ने सबके

३७७ लंकाकाण्ड हृदयमें खूब आनन्द बढ़ाया। फिर वे भरत, शत्रुघ्न माताओंसे मिले। उस समय जो अपरिमित प्रेम उमड़ा, उसका किस प्रकार वर्णन करूँ ॥ ६ ॥ मुनिमण्डलने उसी दिन तुरन्त अति आनन्दित हो राज्याभिषेककी तैयारी कर दी। तुलसीदासने भी आदरपूर्वक महाराज रघुनाथजीका गुणगान किया है ॥ ७ ॥ राज्याभिषेक राग जैतश्री [ २२ ] रन जीति राम राउ आए। सानुज सदल ससीय कुसल आजु, अवध आनंद-बधाए ॥ १ ॥ अरिपुर जारि, उजारि, मारि रिपु, बिबुध सुबास बसाए। धरनि-धेनु, महिदेव-साधु, सबके सब सोच नसाए ॥ २ ॥ दई लंक, थिर थपे बिभीषन, बचन-पियूष पिआए। सुधा सींचि कपि, कृपा नगर-नर-नारि निहारि जिआए ॥ ३ ॥ मिलिगुर, बंधु, मातु, जन, परिजन, भए सकल मन भाए। दरस-हरस दसचारि बरसके दुख पलमें बिसराए ॥ ४ ॥ बोलि सचिव सुचि, सोधि सुदिन, मुनि मंगल-साज सजाए। महाराज-अभिषेक बरषि सुर सुमन निसान बजाए ॥ ५ ॥ लै लै भेंट नृप-अहिप-लोकपति अति सनेह सिर नाए। पूजि, प्रीति पहिचानि राम आदरे अधिक, अपनाए ॥ ६ ॥ दान मान सनमानि जानि रुचि, जाचक जन पहिराए। गए सोक-सर सूखि, मोद-सरिता-समुद्र गहिराए ॥ ७ ॥ प्रभु-प्रताप रबि अहित-अमंगल-अघ-उलूक-तम ताए। किये बिसोक हित-कोक-कोकनद लोक सुजस सुभ छाए ॥ ८ ॥