भारतकोश
गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

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पृष्ठ 383

३७७ लंकाकाण्ड हृदयमें खूब आनन्द बढ़ाया। फिर वे भरत, शत्रुघ्न माताओंसे मिले। उस समय जो अपरिमित प्रेम उमड़ा, उसका किस प्रकार वर्णन करूँ ॥ ६ ॥ मुनिमण्डलने उसी दिन तुरन्त अति आनन्दित हो राज्याभिषेककी तैयारी कर दी। तुलसीदासने भी आदरपूर्वक महाराज रघुनाथजीका गुणगान किया है ॥ ७ ॥ राज्याभिषेक राग जैतश्री [ २२ ] रन जीति राम राउ आए। सानुज सदल ससीय कुसल आजु, अवध आनंद-बधाए ॥ १ ॥ अरिपुर जारि, उजारि, मारि रिपु, बिबुध सुबास बसाए। धरनि-धेनु, महिदेव-साधु, सबके सब सोच नसाए ॥ २ ॥ दई लंक, थिर थपे बिभीषन, बचन-पियूष पिआए। सुधा सींचि कपि, कृपा नगर-नर-नारि निहारि जिआए ॥ ३ ॥ मिलिगुर, बंधु, मातु, जन, परिजन, भए सकल मन भाए। दरस-हरस दसचारि बरसके दुख पलमें बिसराए ॥ ४ ॥ बोलि सचिव सुचि, सोधि सुदिन, मुनि मंगल-साज सजाए। महाराज-अभिषेक बरषि सुर सुमन निसान बजाए ॥ ५ ॥ लै लै भेंट नृप-अहिप-लोकपति अति सनेह सिर नाए। पूजि, प्रीति पहिचानि राम आदरे अधिक, अपनाए ॥ ६ ॥ दान मान सनमानि जानि रुचि, जाचक जन पहिराए। गए सोक-सर सूखि, मोद-सरिता-समुद्र गहिराए ॥ ७ ॥ प्रभु-प्रताप रबि अहित-अमंगल-अघ-उलूक-तम ताए। किये बिसोक हित-कोक-कोकनद लोक सुजस सुभ छाए ॥ ८ ॥