गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगीतावली ३७६ 'अवधि आजु' यौँ कहत परसपर, बेगिबिमान निकट पुर आयो । उतरि अनुज-अनुगनि समेत प्रभु गुर-द्विजगन सिर नायो ॥ ५ ॥ जौ जेहि जोग राम तेहि बिधि मिलि, सबके मन अति मोद बढ़ायो । भेंटी मातु, भरत भरतानुज, क्यौं कहौं प्रेम अमित अनमायो । ६ । तेहि दिन मुनिबृन्द अनंदित तुरत तिलकको साज सजायो । महाराज रघुबंस नाथको सादर तुलसिदास गुन गायो ॥ ७ ॥ [भगवान्की वनमें की हुई लीलाओंको सुनकर नगरके लोग आपसमें कहने लगे—] क्यों जी, सुना जाता है रामचन्द्रजीने समुद्रका पुल बँधवाया था ? कोई एक दूत कोसलपति भगवान् रामका सारा कुशल-समाचार भरतजीके पास लाया था ॥ १ ॥ कहते हैं, कृपासागर रामने विराध, खर, दूषण, और त्रिशिराका वध किया, शूर्पणखाको कुरूपा बना दिया तथा कबन्धको मारकर, बलसे अंधे हुए बालिका दमनकर सुग्रीवका घर बसा दिया ॥ २ ॥ फिर शरणमें आये हुए विभीषणको अपनाकर रावणको सकुटुम्ब समूल नष्ट कर दिया । इस प्रकार अपनी भुजाओंका आश्रय दे देवसमाज- की रक्षा कर अपना 'बंदिछोर' यह श्रेष्ठ सुयश प्रसिद्ध किया ॥ ३ ॥ इसी तरह एक-एकसे समाचार पा सब नागरिक जहाँ-तहाँ दौड़ने लगे, जैसे मेघकी ध्वनि सुनकर मयूर प्रसन्न हो जायें, अथवा समुद्रमें डूबते हुएको किनारा मिल जाय ॥ ४ ॥ 'वनवासकी अवधि आज ही है' इस प्रकार आपसमें कहते-कहते शीघ्र ही विमान नगरके निकट आ गया । उससे भाई लक्ष्मण और अपने अनुचरोंके सहित उतरकर प्रभुने गुरु तथा अन्य ब्राह्मणोंको सिर नवाया ॥ ५॥ जो जिस योग्य था उससे उसी प्रकार मिलकर रामचन्द्रजी ने सबके