गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३७५ लंकाकाण्ड फल दे'—इस प्रकार सब रानियाँ हाथ जोड़कर प्रार्थना करती हैं ॥ २ ॥ उनके ये स्नेहपूर्ण वचन सुनकर वह चील उनके पास होकर सुन्दर मण्डल बाँधकर मँड़राने लगी । उस समय आकाश- में उसकी शुभ, आनन्द और मङ्गलमयी ध्वनि सुन-सुनकर उनके हृदयकी तपन शान्त हो गयी ॥ ३ ॥ दिशा-विदिशाओंमें सबके शुभ अङ्ग फड़कने लगे, मन प्रसन्न हो गये और दुःखमयी दशा का अन्त हो गया तथा कौसल्या आदि सुचतुर स्त्रियाँ तरह-तरहकी बलि और शकुन मनाती हुईं प्रेमसे पुलकितशरीर हो अपने इष्टदेवोंको प्रणाम करने लगीं ॥ ४ ॥ इसी समय हनुमान्जी ने भरतजीको सारा मंगल समाचार सुनाया । तुलसी- दासजी कहते हैं, उस [मंगल-समाचाररूप] अभीष्ट संजीवनी बूटीने उनकी अत्यन्त घोर वियोग-व्यथाको नष्ट कर दिया ॥ ५ ॥ अयोध्यामें आनंद राग धनाश्री [ २१ ] सुनियत सागर सेतु बँधायो । कौसलपतिकी कुसल सकल सुधि कोउ इक दूत भरत पहँ ल्यायो ।१। बध्यो बिराध, त्रिसिर, खर-दूषन सूर्पनखाको रूप नसायो । हति कबंध, बल-अंध बालि दलि, कृपासिंधु सुग्रीव बसायो ॥ २ ॥ सरनागत अपनाइ विभीषन, रावन सकुल समूल बहायो । बिबुध-समाज निवाजि, बाँह दै, बंदिछोर बर बिरद कहायो ॥ ३ ॥ एक-एकसों समाचार सुनि नगर लोग जहँ तहँ सब धायो । घन धुनि अकनि मुदित मयूर-ज्यों, बूड़त जलधि पार-सो पायो ॥४॥