गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगीतावली ३७४ जाती हैं और किसी ज्योतिषीको बुला, उसके पैरों पड़, प्रेममें मग्न होकर मधुर वाणीसे पूछती हैं ॥ ३ ॥ इसी समय भरतजीके पाससे कोई रघुनाथजीके आनेका समाचार लेकर आया । तुलसीदासजी कहते हैं, उसके मुखसे भगवान्का आगमन सुनते ही [कौसल्या- जीको ऐसी शान्ति मिली] मानो मरती हुई मछलीको जल मिल गया हो ॥ ४ ॥ राग गौरी [ २० ] क्षेमकरी ! बलि, बोलि सुबानी । कुसल क्षेम सिय-राम-लषन कब ऐहैं, अंब ! अवधरजधानी ॥ १ ॥ ससिमुखि, कुंकुम बरनि, सुलोचन, मोवनि सोचनि बेद बखानी । देवि ! दयाकरि देहि दरसफल, जोरि पानि बिनवहिं सब रानी ॥ २ ॥ सुनि सनेहमय बचन, निकट ह्वैं मंजुल मंडल कै मड़रानी । सुभ मंगल आनंद गगन-धुनि अकनि-अकनि उर-जरनि जुड़ानी ३ फरकन लगे सुअंग बिदिसि दिसि, मन प्रसन्न, दुख-दसा सिरानी । करहिं प्रनाम सप्रेम पुलकि तनु, मानि बिबिध बलि सगुन सयानी ॥४॥ तेहि अवसर हनुमान भरतसों कही सकल कल्यान-कहानी । तुलसीदास सोइ चाह सजीवनि बिषम बियोग व्यथा बड़ि भानी ॥५॥ 'अरी क्षेमकरी (लाल चील) ! मैं बलिहारी जाती हूँ। अरी मैया ! तू अपनी सुन्दर वाणीसे सच-सच बता कि सीता, राम और लक्ष्मण कुशल-क्षेमपूर्वक कब अपनी राजधानी अयोध्याको लौट आवेंगे ? ॥ १ ॥ हे देवि ! तू चन्द्रमाके समान मुखवाली, कुंकुमवर्णा और सुनयना है; वेदोंने तुझे सब प्रकारके शोकोंसे छुड़ानेवाली कहा है। तू दया करके हमें अपने दर्शनोंका