गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३७३ लंकाकाण्ड वे वर्षा, वायु तथा भीषण शीत और घाम सहते हुए बिना वस्त्रके ही पृथ्वीपर पड़े रहते होंगे । वनमें कन्द, मूल और फल-फूल आदि ही खानेको मिलते हैं, और वह भोजन भी उन्हें समयपर खानेको कैसे मिलता होगा ? ॥ २ ॥ जिन्हें देखकर लता और वृक्षादिको भी शोक होगा तथा पक्षी, मृग और मुनियोंके नेत्रोंसे जल चूने लगेगा, मैं उन्हींकी माता हूँ ! भला मुझ-जैसी निष्ठुरहृदया भी कोई कहीं होगी ?' ॥ ३ ॥ राग सोरठ [ १९ ] बैठी सगुन मनावति माता । कब ऐहैं मेरे बाल कुसल घर, कहहु, काग ! फुरि बाता ॥ १ ॥ दूध-भातकी दौनी दैहों, सोने चोंच मढ़ैहौं । जब सिय-सहित बिलोकि नयन भरि राम-लषन उर लैहौ ॥ २ ॥ अवधि समीप जानि जननी जिय अति आतुर अकुलानी । गनक बोलाइ, पाँय परि पूछति प्रेम मगन मृदु बानी ॥ ३ ॥ तेहि अवसर कोउ भरत निकटतें समाचार लै आयो । प्रभु-आगमन सुनत तुलसी मनो मीन मरत जल पायो ॥ ४ । माता बैठी-बैठी शकुन मनाती है—'अरे काक ! सच-सच बता, मेरे बालक कुशलपूर्वक कब घर आ जायेंगे ? ॥ १ ॥ जिस समय मैं नेत्र भरकर सीताके सहित राम और लक्ष्मणको देखकर हृदयसे लगाऊँगी, उस समय मैं तुझे दूध-भातका दोना दूँगी और तेरी चोंच सोनेसे मढ़वा दूँगी ॥ २ ॥ फिर वनवासी अवधिको समीप ही जान माता अत्यन्त आतुर होकर हृदयमें व्याकुल हो