भारतकोश
गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

पृष्ठ 379, कुल 454 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 379

३७३ लंकाकाण्ड वे वर्षा, वायु तथा भीषण शीत और घाम सहते हुए बिना वस्त्रके ही पृथ्वीपर पड़े रहते होंगे । वनमें कन्द, मूल और फल-फूल आदि ही खानेको मिलते हैं, और वह भोजन भी उन्हें समयपर खानेको कैसे मिलता होगा ? ॥ २ ॥ जिन्हें देखकर लता और वृक्षादिको भी शोक होगा तथा पक्षी, मृग और मुनियोंके नेत्रोंसे जल चूने लगेगा, मैं उन्हींकी माता हूँ ! भला मुझ-जैसी निष्ठुरहृदया भी कोई कहीं होगी ?' ॥ ३ ॥ राग सोरठ [ १९ ] बैठी सगुन मनावति माता । कब ऐहैं मेरे बाल कुसल घर, कहहु, काग ! फुरि बाता ॥ १ ॥ दूध-भातकी दौनी दैहों, सोने चोंच मढ़ैहौं । जब सिय-सहित बिलोकि नयन भरि राम-लषन उर लैहौ ॥ २ ॥ अवधि समीप जानि जननी जिय अति आतुर अकुलानी । गनक बोलाइ, पाँय परि पूछति प्रेम मगन मृदु बानी ॥ ३ ॥ तेहि अवसर कोउ भरत निकटतें समाचार लै आयो । प्रभु-आगमन सुनत तुलसी मनो मीन मरत जल पायो ॥ ४ । माता बैठी-बैठी शकुन मनाती है—'अरे काक ! सच-सच बता, मेरे बालक कुशलपूर्वक कब घर आ जायेंगे ? ॥ १ ॥ जिस समय मैं नेत्र भरकर सीताके सहित राम और लक्ष्मणको देखकर हृदयसे लगाऊँगी, उस समय मैं तुझे दूध-भातका दोना दूँगी और तेरी चोंच सोनेसे मढ़वा दूँगी ॥ २ ॥ फिर वनवासी अवधिको समीप ही जान माता अत्यन्त आतुर होकर हृदयमें व्याकुल हो

गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक) · पृष्ठ 379, कुल 454 में से · BharatKosha