गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
३७५ लंकाकाण्ड फल दे'—इस प्रकार सब रानियाँ हाथ जोड़कर प्रार्थना करती हैं ॥ २ ॥ उनके ये स्नेहपूर्ण वचन सुनकर वह चील उनके पास होकर सुन्दर मण्डल बाँधकर मँड़राने लगी । उस समय आकाश- में उसकी शुभ, आनन्द और मङ्गलमयी ध्वनि सुन-सुनकर उनके हृदयकी तपन शान्त हो गयी ॥ ३ ॥ दिशा-विदिशाओंमें सबके शुभ अङ्ग फड़कने लगे, मन प्रसन्न हो गये और दुःखमयी दशा का अन्त हो गया तथा कौसल्या आदि सुचतुर स्त्रियाँ तरह-तरहकी बलि और शकुन मनाती हुईं प्रेमसे पुलकितशरीर हो अपने इष्टदेवोंको प्रणाम करने लगीं ॥ ४ ॥ इसी समय हनुमान्जी ने भरतजीको सारा मंगल समाचार सुनाया । तुलसी- दासजी कहते हैं, उस [मंगल-समाचाररूप] अभीष्ट संजीवनी बूटीने उनकी अत्यन्त घोर वियोग-व्यथाको नष्ट कर दिया ॥ ५ ॥ अयोध्यामें आनंद राग धनाश्री [ २१ ] सुनियत सागर सेतु बँधायो । कौसलपतिकी कुसल सकल सुधि कोउ इक दूत भरत पहँ ल्यायो ।१। बध्यो बिराध, त्रिसिर, खर-दूषन सूर्पनखाको रूप नसायो । हति कबंध, बल-अंध बालि दलि, कृपासिंधु सुग्रीव बसायो ॥ २ ॥ सरनागत अपनाइ विभीषन, रावन सकुल समूल बहायो । बिबुध-समाज निवाजि, बाँह दै, बंदिछोर बर बिरद कहायो ॥ ३ ॥ एक-एकसों समाचार सुनि नगर लोग जहँ तहँ सब धायो । घन धुनि अकनि मुदित मयूर-ज्यों, बूड़त जलधि पार-सो पायो ॥४॥
गीतावली ३७६ 'अवधि आजु' यौँ कहत परसपर, बेगिबिमान निकट पुर आयो । उतरि अनुज-अनुगनि समेत प्रभु गुर-द्विजगन सिर नायो ॥ ५ ॥ जौ जेहि जोग राम तेहि बिधि मिलि, सबके मन अति मोद बढ़ायो । भेंटी मातु, भरत भरतानुज, क्यौं कहौं प्रेम अमित अनमायो । ६ । तेहि दिन मुनिबृन्द अनंदित तुरत तिलकको साज सजायो । महाराज रघुबंस नाथको सादर तुलसिदास गुन गायो ॥ ७ ॥ [भगवान्की वनमें की हुई लीलाओंको सुनकर नगरके लोग आपसमें कहने लगे—] क्यों जी, सुना जाता है रामचन्द्रजीने समुद्रका पुल बँधवाया था ? कोई एक दूत कोसलपति भगवान् रामका सारा कुशल-समाचार भरतजीके पास लाया था ॥ १ ॥ कहते हैं, कृपासागर रामने विराध, खर, दूषण, और त्रिशिराका वध किया, शूर्पणखाको कुरूपा बना दिया तथा कबन्धको मारकर, बलसे अंधे हुए बालिका दमनकर सुग्रीवका घर बसा दिया ॥ २ ॥ फिर शरणमें आये हुए विभीषणको अपनाकर रावणको सकुटुम्ब समूल नष्ट कर दिया । इस प्रकार अपनी भुजाओंका आश्रय दे देवसमाज- की रक्षा कर अपना 'बंदिछोर' यह श्रेष्ठ सुयश प्रसिद्ध किया ॥ ३ ॥ इसी तरह एक-एकसे समाचार पा सब नागरिक जहाँ-तहाँ दौड़ने लगे, जैसे मेघकी ध्वनि सुनकर मयूर प्रसन्न हो जायें, अथवा समुद्रमें डूबते हुएको किनारा मिल जाय ॥ ४ ॥ 'वनवासकी अवधि आज ही है' इस प्रकार आपसमें कहते-कहते शीघ्र ही विमान नगरके निकट आ गया । उससे भाई लक्ष्मण और अपने अनुचरोंके सहित उतरकर प्रभुने गुरु तथा अन्य ब्राह्मणोंको सिर नवाया ॥ ५॥ जो जिस योग्य था उससे उसी प्रकार मिलकर रामचन्द्रजी ने सबके
३७७ लंकाकाण्ड हृदयमें खूब आनन्द बढ़ाया। फिर वे भरत, शत्रुघ्न माताओंसे मिले। उस समय जो अपरिमित प्रेम उमड़ा, उसका किस प्रकार वर्णन करूँ ॥ ६ ॥ मुनिमण्डलने उसी दिन तुरन्त अति आनन्दित हो राज्याभिषेककी तैयारी कर दी। तुलसीदासने भी आदरपूर्वक महाराज रघुनाथजीका गुणगान किया है ॥ ७ ॥ राज्याभिषेक राग जैतश्री [ २२ ] रन जीति राम राउ आए। सानुज सदल ससीय कुसल आजु, अवध आनंद-बधाए ॥ १ ॥ अरिपुर जारि, उजारि, मारि रिपु, बिबुध सुबास बसाए। धरनि-धेनु, महिदेव-साधु, सबके सब सोच नसाए ॥ २ ॥ दई लंक, थिर थपे बिभीषन, बचन-पियूष पिआए। सुधा सींचि कपि, कृपा नगर-नर-नारि निहारि जिआए ॥ ३ ॥ मिलिगुर, बंधु, मातु, जन, परिजन, भए सकल मन भाए। दरस-हरस दसचारि बरसके दुख पलमें बिसराए ॥ ४ ॥ बोलि सचिव सुचि, सोधि सुदिन, मुनि मंगल-साज सजाए। महाराज-अभिषेक बरषि सुर सुमन निसान बजाए ॥ ५ ॥ लै लै भेंट नृप-अहिप-लोकपति अति सनेह सिर नाए। पूजि, प्रीति पहिचानि राम आदरे अधिक, अपनाए ॥ ६ ॥ दान मान सनमानि जानि रुचि, जाचक जन पहिराए। गए सोक-सर सूखि, मोद-सरिता-समुद्र गहिराए ॥ ७ ॥ प्रभु-प्रताप रबि अहित-अमंगल-अघ-उलूक-तम ताए। किये बिसोक हित-कोक-कोकनद लोक सुजस सुभ छाए ॥ ८ ॥
गीतावली ३७८ रामराज कुलकाज सुमंगल, सबनि सबै सुख पाए। देहिं असीस भूमिसुर प्रमुदित, प्रजा प्रमोद बढ़ाए ॥ ९ ॥ आश्रम-धरम-बिभाग बेदपथ पावन लोग चलाए। धरम-निरत, सिय-राम-चरन-रत, मनहु राम-सिय-जाए ॥ १० ॥ कामधेनु महि, बिटप कामतरु, कोउ बिधि बाम न लाये। ते तब, अब तुलसी तेउ जिन्ह हित सहित राम-गुन गाये ॥ ११ ॥ महाराज राम युद्ध जीतकर भाई, सेना और सीताके सहित सकुशल आ गये हैं। इसलिये आज अयोध्यामें आनन्दोत्सव हो रहा हैं ॥ १ ॥ उन्होंने शत्रुके नगरको उजाड़ और जलाकर तथा शत्रु- को मारकर देवताओंके घरोंको बसाया है। पृथ्वी, गौ, ब्राह्मण और साधु, इन सबके सभी शोक नष्ट कर दिये हैं ॥ २ ॥ विभीषणको लंका देकर उन्हें स्थिरतापूर्वक राज्याभिषिक्त कर वचनरूप अमृत पिलाया है और (युद्धमें मरे हुए) वानरोंको अमृतसे सींचकर जीवित कर अब अयोध्याके नर-नारियोंको कृपादृष्टिसे निहारकर जीवन-दान दिया है ॥ ३ ॥ गुरु, भाई, माता, सेवक और कुटुम्बीलोग प्रभुसे मिले, इससे उन सबकी सभी मनःकामनाएँ पूर्ण हो गयीं और प्रभुके दर्शनके आनन्दमें वे चौदह वर्षके दुःखों- को एक पलभरमें भूल गये ॥ ॥ मुनिवर वसिष्ठजीने सुमन्त आदि पवित्रचित्त मन्त्रियोंको बुलाकर शुभ दिन शोधकर मंगल-सामग्रियाँ एकत्र करायीं। भगवान् रामके राज्याभिषेकके समय देवताओंने फूल बरसाकर दुन्दुभी आदि बाजे बजाये ॥ ५ ॥ तथा भूपति, अहिपति और लोकपतियोंने तरह-तरहकी भेंटे ले भगवान्का पूजनकर उन्हें अत्यन्त प्रेमसे सिर नवाये। भगवान् रामने उनका प्रेम पहचानकर
३७१ लंकाकाण्ड खूब आदर किया और उन्हें अच्छी तरह अपनाया ॥ ६ ॥ फिर याचकोंको, उनकी रुचि देख-देखकर दान और मानसे सन्तुष्ट किया तथा उन्हें वस्त्रादि पहनाये । इससे उनके शोकरूप सरोवर सूख गये तथा आनन्दरूप नदी और समुद्र गम्भीर हो गये ॥ ७ ॥ प्रभुके प्रतापरूप सूर्यके सामने अहित, अमङ्गल और पापरूप उल्लू तथा अन्धकार लीन हो गये, सुहृद्रूप कोक (चकवा-चकवी) एवं कोकनद (कमल) शोकहीन हो गये तथा सम्पूर्ण लोकोंमें उनका सुयश छा गया ॥ ८ ॥ रामचन्द्रजीके राज्यमें सारे लौकिक कार्य मङ्गलमय रहे, सबको सब प्रकारके सुख प्राप्त हुए तथा ब्राह्मण लोग प्रसन्नतापूर्वक आशीर्वाद देकर प्रजाका आनन्द बढ़ाते रहे ॥ ९ ॥ भगवान् श्रीरामने आश्रमधर्मका विभाग कर लोगोंको पवित्र वेदमार्गपर प्रवर्तित किया । सब लोग धर्मपरायण तथा राम और सीताके चरणोंमें प्रीति करनेवाले थे, मानो साक्षात् राम और सीतासे ही उत्पन्न हुए हों ॥ १० ॥ पृथिवी कामधेनुरूप तथा वृक्ष कल्पतरुके समान हो गये; विधाता किसीके प्रति विपरीत नहीं रहा । तुलसी- दासजी कहते हैं, यह तो उस समयके लोगोंकी बात है, किन्तु इस समय भी जिन्होंने प्रीतिपूर्वक रघुनाथजीके गुण गाये हैं, उन्हें वही आनन्द प्राप्त हुआ है ॥ ११ ॥ राग टोड़ी [ २३ ] आजु अवध आनंद-बधावन, रिपुरन जीति राम आए । सजि सुबिमान निसान बजावत मुदित देव देखन धाए ॥ १ ॥ घर घर चारु चौक चंदन-मनि, मंगल-कलस सबनि साजे । ध्वज-पताक, तोरन, बितानबर, बिबिध भांति बाजन बाजे ॥ २ ॥
गीतावली ३८० राम-तिलक सुनि दीप दीपके नृप आए उपहार लिये। सोयसहित आसीन सिंहासन निरिख जोहारत हरष हिये ॥ ३ ॥ मंगलगान, बेदधुनि, जयधुनि, मुनि-आसीस-धुनि भुवन भरे। बरषि सुमन सुर-सिद्ध प्रसंसत, सबके सब संताप हरे ॥ ४ ॥ राम-राज भइ कामधेनु महि, सुख संपदा लोक छाए। जनम जनम जानकीनाथके गुनगन तुलसिदास गाये ॥ ५ ॥ महाराज राम शत्रुको युद्धमें जीतकर आये हैं; इसलिये आज अयोध्यामें आनन्दमय बधावा हो रहा है। देवतालोग अपने सुन्दर विमान सजाकर प्रसन्नतापूर्वक बाजे बजाते उन्हें देखनेके लिये दौड़े आ रहे हैं ॥ १ ॥ घर-घरमें चन्दन और मणियोंके सुन्दर चौक पूरे गये हैं, सबने मङ्गलकलश तथा ध्वजा, पताका, तोरण और अच्छे- अच्छे चँदोवे सजाये हैं तथा जगह-जगह तरह-तरहके बाजे बज रहे हैं ॥ २ ॥ रामचन्द्रजीके राज्याभिषेकका समाचार सुनकर द्वीप- द्विपान्तरोंके राजालोग उपहार लिये आये हैं, और भगवान् रामको सीताजीके सहित सिंहासनपर बैठे देख हृदयमें हर्षित होकर जुहारते हैं ॥ ३ ॥ सारे भुवन मङ्गलगान, वेदध्वनि, जयघोष और मुनीश्वरोंके आशीर्वादात्मक शब्दोंसे भरे हुए हैं। देवता और सिद्धलोग पुष्प बरसाकर भगवान्की प्रशंसा करते हैं तथा भगवान्ने भी सबके सभी दुःख दूर कर दिये हैं ॥ ४ ॥ भगवान् रामके राज्यमें पृथ्वी कामधेनुरूपा हो गयी है और सम्पूर्ण लोक सुख एवं सम्पत्तिसे छा गये हैं। तुलसीदासने भी जन्म-जन्ममें श्रीसीतापतिके ही गुणगणका गान किया है ॥ ५ ॥
ॐ श्रीसीतारामभ्यां नमः गीतावली —★★— उत्तरकाण्ड रामराज्य राग सोरठ [ १ ] बनतें आइकै राजा राम भए भुआल । मुदित चौदह भुअन, सब सुख सुखी सब सब काल ॥ १ ॥ मिटे कलुष-कलेस-कु लषन, कपट-कुपथ-कुचाल । गए दारिद, दोष दारुन, दंभ-दुरित-दुकाल ॥ २ ॥ कामधुक महि, कामतरु तरु, उपल मनिगन लाल । नारि-नर तेहि समय सुकृति, भरे भाग सुभाल ॥ ३ ॥ बरन-आश्रम-धरमरत, मन बचन बेष मराल । राम-सिय-सेवक-सनेही, साधु, सुमुख, रसाल ॥ ४ ॥ राम-राज-समाज बरनत सिद्ध-सुर-दिगपाल । सुमिरि सो तुलसी अजहुँ हिय हरष होत बिसाल ॥ ५ ॥ बनसे आकर महाराज राम भूपति हुए। उनके राज्यमें चौदहों भुवन आनन्दित हो गये और सब लोग सब समय सब प्रकारके सुखोंसे सुखी रहने लगे ॥ १ ॥ सब प्रकारके पाप, क्लेश, कुलक्षण, कपट, कुमार्ग और कुचाल नष्ट हो गये तथा दरिद्रता, दारुण दोष, दम्भ, दुरित और दुष्काल आदिका नाम मिट गया ॥ २॥
गीतावली ३८२ पृथ्वी कामधेनुरूपा हो गयी, वृक्ष साक्षात् कल्पतरु हो गये और पत्थर मणि तथा लाल आदि हो गये । इस प्रकार उस समय सभी स्त्री, पुरुष पुण्यवान् एवं भाग्यशाली थे ॥ ३ ॥ वे अपने-अपने वर्णाश्रमधर्मोंमें तत्पर, मन, वचन और वेषसे हंसके समान स्वच्छ- पवित्र, राम और सीताके सेवक, प्रेमी, साधुचरित, प्रसन्नवदन एवं विनम्र थे ॥ ४ ॥ भगवान् रामके राजसमाजका तो सिद्ध, देवता और दिग्पालगण भी बखान किया करते थे । तुलसीदासजी कहते हैं, उसकी बातोंको याद करके हृदयमें आज भी अत्यन्त आनन्द होता है ॥ ५ ॥ रामरूप-वर्णन राग ललित [ २ ] भोर जानकी जीवन जागे । सूत-मागध प्रबीन, बेनु-बीना-धुनि द्वारे, गायक सरस राग रागे । १ । स्यामल सलोने गात, आलसबस जँभात प्रिया प्रेमरस पागे । उनींदे लोचन चारु, मुख-सुखमा-सिंगार हेरि हारे मार मूरि भागे २ सहज सुहाई छबि, उपमा न लहैं कबि, मुदित, बिलोकन लागे । तुलसिदास निसिबासर अनूप रूप रहत प्रेम-अनुरागे ॥ ३ ॥ प्रातःकाल होते ही जानकी जीवन भगवान् राम जागे । उस समय सुचतुर सूत और मागधोंने विरदावली कहना आरम्भ कर दिया, द्वारपर बाँसुरी और वीणाकी ध्वनि होने लगी तथा गायकोंने सरस राग अलापना आरम्भ कर दिया ॥ १ ॥ भगवान्का अति सुन्दर श्याम शरीर प्रियाके प्रेमरसमें पगकर आलस्यके कारण
३८३ उत्तरकाण्ड अँगड़ाने लगा। उनके कुछ उनीदे-से मनोहर नेत्र तथा मुखकी प्रतिभा और शृङ्गार देखकर अनेकों कामदेव भी हार मानकर भाग गये ॥ २ ॥ उनकी छवि स्वभावसे ही शोभामयी है, उसकी उपमा कोई भी कवि नहीं पा सकता; अतः वे प्रसन्नतापूर्वक उसकी ओर देखते रहते हैं। तुलसीदास कहते हैं, इस प्रकार वे अहर्निश प्रभु- के अनूप रूपके प्रेममें मग्न रहते हैं ॥ ३ ॥ राग कल्याण [ ३ ] रघुपति राजीवनयन सोभातन, कोटि मयन, करुनारस-अयन अयन-रूप भूप, माई। देखो सखि-अतुलित छवि, संत-कंज-कानन रवि, गावत कल कीरति कबि-कोबिद-समुदाई ॥ १ ॥ मज्जन करि सरजुतीर ठाढ़े रघुबंसबीर, । सेवत पदकमल धीर निरमल चित लाई। ब्रह्ममंडली-मुनींद्रबृंद-मध्य इंदुबदन राजत सुखसदन लोकलोचन-सुखदाई ॥ २ ॥ बिथुरित सिररुह बरूथ कुंचित, बिच सुमन-जूथि, मनिजुत सिसु-फनि-अनेक ससि समीप आई। जनु सभीति दै अँकोर राखे जुग रुचिर मोर, कुंडल-छवि निरखि चोर सकुच अधिकाई ॥ ३ ॥ ललित भ्रुकुटि, तिलक भाल, चिबुक-अधर-द्विज रसाल, हास चारुतर, कपोल, नासिका सुहाई। मधुकर जुग पंकज बिच, सुक बिलोकि नीरजपर लरत मधुप-अवलि मानो बीच कियो जाई ॥ ४ ॥
गीतावली ३८४ सुंदर पटपीत बिसद, भ्राजत बनमाल उरसि, तुलसिका-प्रसून-रचित, बिबिध-बिधि बनाई। तरु-तमाल अधबिच जनु त्रिबिधि कोरपाँति-रुचिर, हेमजाल अंतर परि तातें न उड़ाई॥ ५ ॥ संकर-ह्रद-पुंडरीक निसि बस. हरि-चंकरीक, निर्व्यलोक-मानस-गृह संतत रहे छाई। अतिसय आनंदमूल तुलसिदास सानुकूल, हरन सकल सूल, अवध-मंडन रघुराई॥ ६ ॥ अरी माई ! कमलनयन महाराज रघुनाथजी करोड़ों कामदेवों- के समान सुन्दर शरीरवाले, करुणा-रसके आगार और आनन्दस्वरूप हैं। सखि ! देखो, उनकी अतुलित छवि साधु-समाजरूप कमलवन- के लिये सूर्यस्वरूप है और उनकी पवित्र कीर्ति कवि तथा विद्वत्समुदाय गान करते हैं॥ १॥ अहा ! रघुवंशवीर श्रीरामचन्द्रजी स्नान करनेके अनन्तर सरयूतटपर खड़े हैं। उनके चरणकमलोंको मनस्वी भक्तगण अपना निर्मल चित्त लगाकर सेवन कर रहे हैं। इस प्रकार सम्पूर्ण लोकोंके नेत्रोंको आनन्दित करनेवाले आनन्दधाम चन्द्रवदन भगवान् राम ब्राह्मणसमाज तथा मुनीन्द्रमण्डलीके मध्यमें विराजमान हैं॥ २॥ उनकी कुञ्चित अलकावली बिथुरी हुई है, जिनके बीच-बीचमें फूलोंके गुच्छे लगे हैं। वे ऐसे मालूम होते हैं मानो मणियोंके सहित बालसर्पोंका समुदाय चन्द्रमाके समीप आया हो और उसे देखकर चन्द्रमाने भयभीत होकर उससे बचनेके लिये दो मनोहर मोरोंको फुसलाकर रख छोड़ा हो और उन (मोररूप) कुण्डलोंकी छवि देखकर वे (सर्परूप) चोर अत्यन्त सकुचाते हों।
३८५ उत्तरकाण्ड [यहाँ भगवान्का मुख चन्द्रमा है, केशकलाप सर्पबालक हैं, उनमें गूँथे हुए फूल उनकी मणियाँ हैं और कानोंके कुण्डल दो मोर हैं] ॥ ३ ॥ उनकी भ्रूकुटि अत्यन्त सुन्दर है, माथेपर तिलक शोभायमान है तथा चिबुक, अधर और दन्तावली बड़ी ही सरस हैं। उनकी हँसी बड़ी ही मनमोहिनी तथा कपोल और नासिका बड़े ही सुघड़ हैं। ऐसा जान पड़ता है मानो [नेत्ररूप] कमलों- पर [भ्रूकुटिरूप] दो भौंरे बैठे हैं; तथा [मुखरूप] पङ्कजपर [अलकावलीरूप] भ्रमरोंको लड़ते देख [नासिकारूप] शुकने उनका बीच-बचाव किया हो ॥ ४ ॥ भगवान्के शरीरपर अति सुन्दर और विशद पीताम्बर तथा हृदयमें तुलसी एवं विविध प्रकारके पुष्पोंसे अनेक प्रकारसे बनायी हुई वनमाला शोभायमान है। जो ऐसी मालूम होती है मानो [श्यामशरीररूप] तमालवृक्षके बीचमें [वनमाला-रूप] तिरंगे शुकपक्षियोंकी मनोहर पंक्ति हो और वह [पीताम्बररूप] सुवर्णपाशके भीतर पड़ जानेसे उड़ न सकती हो ॥ ५ ॥ जो रामरूप भ्रमर श्रीशंकरके हृदयकमलमें अहर्निश निवास करते हैं और जो छलहीन पुरुषोंके मनमन्दिरमें निरन्तर बसे रहते हैं, वे सकल तापापहारी अवधविभूषण परमानन्दमूल श्रीरघुनाथजी तुलसीदासपर सर्वदा प्रसन्न रहें ॥ ६ ॥ [ ४ ] राजत रघुबीर धीर, भंजन भव-भीर, पीर- हरन सकल सरजूतीर निरखहु, सखि ! सोहैं। संग अनुज मनुज-निकर, दनुज-बल-बिभंग-करन अंग अंग छबि अनंग अगनित मन मोहैं ॥ १ ॥ गी० २५—
गीतावली ३८६ सुखमा-सुख-सील-अयन नयन निरखि निरखि नील कुंचित कच, कुंडल कल, नासिका चित पोहैं। मनहु इंदुबिंब मध्य कंज-मीन-खंजन लखि मधुप-मकर-कीर आए तकि तकि निज गौहैं॥ २ ॥ ललित गंड-मंडल, सुबिसाल भाल तिलक झलक मंजुतर मयंक-अंक, रुचिर बंक भौंहैं। अरुन अधर मधुर बोल, दसन-दमक दामिनि दुति, हुलसति हिय हँसनि चारु, चितवन तिरछैहैं। ३ ॥ कंबुकंठ, भुज बिसाल उरसि तरुन तुलसिमाल, मंजुल, मुकतावलि जुत जागति जिय जोहैं। जनु कलिंद-नंदनि मनि-इन्द्रनील-सिखर परसि धँसति लसति हंससेनि-संकुल अधिकौहैं॥ ४ ॥ दिब्यतर दुकूल भव्य नब्य रुचिर चंपक चय, चंचला-कलाप, कनक-निकर अलि ! किधौं हैं। सज्जन-चष-झष-निकेत, भूषन-मनिगन समेत, रूप-जलधि-बपुष लेत मन-गयंद बोहैं॥ ५ ॥ थकनि बचन-चातुरी, तुरीय पेखि प्रेम-मगन पग न परत इत उत, सब चकित तेहि समो हैं। तुलसिदास यह बुधि नहि कौनकी, कहाँतें आई, कौन काज, काके ढिग कौन ठाउ को हैं॥ ६ ॥ 'अरी सखि ! देख, संसारके दुःखको दूर करने सर्वतापा- पहारी धीर-वीर रघुनाथजी सरयूतटपर शोभायमान हैं। उनके साथ छोटे भाई और बहुत-से लोग-बाग हैं, वे स्वयं भी शत्रुओंकी सेनाको छिन्न-भिन्न करनेवाले हैं तथा उनके अङ्ग-अङ्गकी शोभा अगणित
३८७ उत्तरकाण्ड. कामदेवोंका मन मोह रही है ॥ १ ॥ उनके सुषमा, शील और आनन्दके भण्डार मनोहर नेत्र देखो तथा काली और घुंघराली अलकें निहारो । अहा ! इनके मनोहर कुण्डल और नासिका तो हमारे चित्तोंको अपनेमें लगाये लेते हैं; मानो चन्द्रबिम्बके मध्यमें कमल, मत्स्य और खञ्जन पक्षीको देखकर उन्हें अपने सजातीय जान भ्रमर, मकर और शुक पक्षी आये हों [यहाँ मुख चन्द्रमण्डल है, नेत्र कमल, मत्स्य और खञ्जन पक्षी हैं, अलकें भ्रमर हैं, कुण्डल मकर हैं तथा नासिका शुक है ] ॥ २ ॥ भगवान्के बड़े ही मनोहर कपोल हैं; अत्यन्त विशाल भालपर तिलक झलक रहा है तथा [मुखचन्द्रपर] चन्द्रमाके चिह्न [मेचकताई] के समान अत्यन्त मनोहर बाँकी भ्रुकुटियाँ हैं। प्रभुके अरुण अधर, सुमधुर बोल, विद्युच्छटाके समान दांतोंकी दमक, मनोहर मुसकान तथा तिरछी चितवन चित्तको उल्लसित कर देती हैं ॥ ३ ॥ भगवान्का कण्ठ शंखके समान है, भुजाएँ लंबी-लंबी हैं तथा हृदयमें मनोहर मुक्ता- वलीके सहित नवीन तुलसीकी माला शोभायमान है । उस छबिको योगिजन हृदयमें इस प्रकार देखते हैं, मानो हंसोंकी पंक्तिके सहित कलिन्दनन्दिनी यमुनाजी इन्द्रनीलमणिके शिखरको स्पर्श करती हुई नीचेको गिरती हुई अत्यन्त शोभा पा रही हों [यहाँ मोतियोंकी माला हंसोंकी पंक्ति है, तुलसीकी माला कालिन्दी है और भगवान्का कंधा इन्द्रनीलमणिका शिखर है] ॥ ४ ॥ अरी आली ! प्रभुका जो महामनोहर नवीन एवं दिव्य दुकूल (उपरना) है वह सुन्दर चम्पक पुष्पोंका समूह तो नहीं है । अथवा वह विद्युत् कलाप किंवा सुवर्णका समूह है । भगवान्का सौन्दर्यसमुद्र शरीर, जो
गीतावली ३८८ सत्पुरुषोंके नेत्ररूप मकरोंका निवास-स्थान एवं भूषणरूप रत्नराशिसे सम्पन्न है, हमारे मनरूप मतंगको अपने अन्दर डुबोये लेता है ॥५॥ उस सखीकी यह वाक्चातुरी देखकर तथा तुरीयरूप भगवान् रामको निहारकर सब सखियाँ प्रेममें डूब गयीं। उनके पैर न तो आगे पड़ते थे और न पीछे; उसय सब-की-सब चकित हो रही थीं। तुलसीदासजी कहते हैं, उन्हें यह सुवि न रही कि कौन किसकी है ? कहाँसे आयी है ? उसका क्या काम है ? किसके पास खड़ी है ? और कौन किस जगह है ? ॥ ६ ॥ [ ५ ] देखु सखि ! आजु रघुनाथ-सोभा बनी । नील-नीरद-बरन बपुष भुवनाभरन, पीत-अंबर-धरन हरन दुति-दामिनी ॥ १ ॥ सरजु मज्जन किए, संग सज्जन लिए, हेतु जापर हिये, कृपा कोमल घनी । सजनि ! आवत भवन मत्त-गजवर, गवन, लंक मृगपति ठवनि, कुँवर कोसलधनी ॥ २ ॥ सघन चिककन कुटिल चिकुर बिलुलित मृदुल, करनि बियरत चतुर, सरस सुषमा जनी । ललित अहि-सिसु-निकर मनहु ससि सन समर लरत, घरहरि करत रुचिर जनु जुग फनी ॥ ३ ॥ भाल भ्राजत तिलक, जलज लोचन, पलक, चारु भ्रू, नासिका सुभग सुक-आननी । चिबुक सुंदर, अधर अरुन, द्विज-दुति सुघर, बचन गंभीर, मृदुहास भव-भाननी ॥ ४ ॥
३८६ उत्तरकाण्ड श्रवन कुंडल बिमल गंड मंडित चपल कलित कलकांति अति भांति कछु तिन्ह तनी । जुगल कंचन-मकर मनहु बिधुकर मधुर पियत पहिचानि करि सिंधुकीरति अनी ॥ ५ ॥ उरसि राजत पदक, ज्योति रचना अधिक, माल सुबिसाल चहुँ पास बनि गजमनी । स्याम नव जलदपर निरखि दिनकर कला कौतुकी मनहुँ रही घेरि उडुगन-अनी ॥ ६ ॥ मंदिरनिपर खरी नारि आनंद-भरी, निरखि बरषहिं बिपुल कुसुम कुंकुम-कनी । दास तुलसी राम परम करुनाधाम काम-सतकोटि-मद हरत छबि आपनी ॥ ७ ॥ अरी सखि ! देख, आज रघुनाथजीकी कैसी शोभा बनी है ! उनका शरीर नीलमेघके समान कान्तिमान् तथा सम्पूर्ण लोकोंका आभूषण है, वे बिजलीकी छटाको छीननेवाला सुन्दर पीताम्बर पहने हुए हैं ॥ १ ॥ अरी सजनी ! देख, कोसलराजकुँवर रघुनाथजी सरयूमें स्नान कर साथमें बहुत-से साधुजनोंको लिये मत्त गजराजकी चालसे राजमहलको आ रहे हैं । उनके हृदयमें दीनोंके प्रति प्रेम, कृपा और अत्यन्त कोमलता है तथा उनकी कटि और ठवनि सिंहके समान है ॥ २ ॥ उनके मुखमण्डलपर घने, चिकने, टेढ़े और मुलायम बाल बिखरे हुए हैं; उन्हें परम चतुर रघुनाथजी हाथोंसे सँवारते हैं। उससे ऐसी सरस शोभा उत्पन्न होती है, मानो मनोहर सर्पशिशुओंका समूह चन्द्रमासे अमृतके लिये झगड़ रहा हो
गीतावली ३६० और उसे दो बड़े सर्प समझाते हों ॥ ३ ॥ प्रभुके मस्तकपर तिलक शोभायमान है, उनके नेत्र कमलके समान हैं, पलक तथा भ्रुकुटी बड़ी मनोहर हैं, सुन्दर नासिका साक्षात् तोतेकी चोंचके समान है, ठोड़ी बड़ी सुन्दर है, अधर अरुणवर्ण हैं, दाँतोंकी कान्ति बड़ी सुहावनी है, वाणी गम्भीर है तथा मृदुल मुसकान संसृति-संतापका शमन करनेवाली है ॥ ४ ॥ भगवान्के कानोंमें कुण्डल हैं, उन्होंने निर्मल कपोलोंको विभूषित कर उनपर एक और ही प्रकारकी चञ्चल और मनोहर कान्ति फैला दी है। वे ऐसे जान पड़ते हैं मानो दो सुनहरे मकर चन्द्रमाकी सुमधुर किरणोंका पान करते हों और उससे परिचय प्राप्तकर समुद्रकी कीर्ति गा रहे हों [क्योंकि समुद्र मकरोंका निवास-स्थान और चन्द्रमाका उत्पत्तिस्थान है ] ॥ ५ ॥ देखो, इनके वक्षःस्थलपर पदिक सुशोभित है, उसकी ज्योति खूब फैली हुई है। उसके चारों ओर गजमुक्ताओंकी सुविशाल माला विराजमान है, मानों नवीन श्याममेघपर सूर्यकी कला देखकर उसे कौतुकवश नक्षत्रमालाने घेर लिया हो [यहाँ शरीर श्याममेघ है, पदिक सूर्यकला है और गजमुक्तामाल नक्षत्रगण हैं। मेघपर सूर्य- कलाका दिखायी देना तथा सूर्यको नक्षत्रोंका घेरना अघटितघटनाका ही कौतुक है] ॥ ६ ॥ इस समय अपने-अपने घरोंपर खड़ी हुई पुरनारियाँ प्रभुको देखकर आनन्द पूर्ण हो उनपर बहुतसे फूल और केसर के परागकी वर्षा कर रही हैं। तुलसीदासजी कहते हैं, इस समय परम कल्याणधाम भगवान् राम अपनी छबिसे अरबों कामदेवों का मानमर्दन करते हैं ॥ ७ ॥
३६१ उत्तरकाण्ड [ ६ ] आजु रघुबीर-छबि जात नहिं कछु कहीं । सुभग सिंघासनासीन, सीतारवन, भुवन-अभिराम, बहु काम सोभा सही ॥ १ ॥ चारु चामर-व्यजन, छत्र-मनिगन बिपुल, दाम-मुकुतावली-जोति जगमगि रही। मनहुँ राकेस सँग हंस-उडुगन-बरहि मिलन आए हृदय जानि निज नाथ ही ॥ २ ॥ मुकुट सुंदर सिरसि, भालबर, तिलक-भ्रू, कुटिल कच, कुंडलनि परम आभा लही । मनहुँ हरडर जुगल मारध्वजके मकर लागि श्रवननि करत मेरुकी बतकही ॥ ३ ॥ अरुन-राजीव-दल-नयन करुना-अयन, बदन सुषमासदन, हास त्रय-तापही । बिबिध कंकन हार, उरसि गजमनि-माल, मनहुँ बाग-पाँति जुगमिलि चली जलवही ॥ ४ ॥ पीत निरमल चैल, मनहुँ मरकत सैल, पृथुल-दामिनि रही छाइ तलि सहजही । ललित सायक-चाप पीन भुज बल अतुल मनुजतनु दनुजबन-दहन, मंडन-मही ॥ ५ ॥ जासु गुन-रूप नहि कलित निरगुन सगुन, संभु, सनकादि, सुक भगति दृढ़ करि गही । दास तुलसी राम-चरन-पंकज सदा बचन मन करम चहै प्रीति नित निरबही ॥ ६ ॥
गीतावली ३६२ आज रघुनाथजीकी छविका कुछ वर्णन नहीं किया जाता। वे त्रिभुवनसुन्दरसीतारमण भगवान् राम सुन्दर सिंहासनपर विराजमान हैं। वे सचमुच अनेकों कामदेवोंके समान शोभा सम्पन्न हैं॥ १ ॥ सुन्दर चँवर, व्यजन, छत्र, अनेकों मणिगण तथा मुक्तामालाओंकी लड़ियोंकी ज्योति जगमगा रही है, मानो अपने प्रभुको हृदयमें पहचानकर [छत्ररूप] चन्द्रमाके सहित [चँवररूप] हंस [मणिगणरूप] तारे और [व्यजनरूप] मोर श्रीरघुनाथजीसे मिलनेके लिये आये हैं॥ २ ॥ प्रभुके सिरपर सुन्दर मुकुट है, ललित ललाटपर तिलक और भ्रुकुटियाँ शोभायमान हैं तथा घुँघराली अलकोंके पास कुण्डलोंकी बड़ी शोभा हो रही है। वे ऐसे जान पड़ते हैं, मानों कामदेवकी ध्वजाके दो मकर भगवान् शंकरके भयसे [प्रभुको उनके स्वामी जान] कानोंसे लगाकर मेलकी बातचीत कर रहे हैं॥ ३ ॥ भगवान्के अरुण कमलदलके समान नेत्र करुणाके भण्डार हैं। उनका मुख सुषमाका आश्रय तथा हास तीनों तापोंको नष्ट करनेवाला है। वे हाथोंमें तरह-तरहके कंकण तथा हृदयमें हार और गजमुक्ताओंकी माला धारण किये हैं, मानो दो बगुलोंकी पंक्तियाँ मिलकर मेघकी ओर जा रही हों ॥ ४ ॥ वे अति स्वच्छ पीताम्बर धारण किये हैं, मानो मरकतमणिके पर्वतपर बहुत-सी बिजली अपने स्वभावको छोड़कर छायी हुई हों। उनके हाथोंमें सुन्दर धनुष-बाण हैं तथा पुष्ट भुजाओंमें अतुलित बल है। उनका यह मनुष्य-शरीर दैत्यवनको जलानेवाला तथा पृथ्वीका आभूषण है । ५ ॥ जो निर्गुण होते हुए भी सगुण हैं तथा जिनके गुण और रूपोंकी कोई गणना नहीं कर सकता; अतः शिव, सनकादि तथा
३६३ उत्तरकाण्ड शुकदेवजीने भी जिनके भक्तिभावको ही दृढ़ करके पकड़ा है, उन भगवान् रामके चरणकमलोंमें तुलसीदास मन, वचन और कर्मसे सदा प्रीति ही निर्वाह चाहता है ॥ ६ ॥ [ ७ ] राव राजराजमौलि मुनिवर-मन-हरन, सरन- लायक, सुखदायक रघुनायक देखी री। लोक-लोचनाभिराम, नीलमणि-तमाल-स्याम, रूप-सील-धाम, अंग छबि अनंग को री ? ॥ १ ॥ लसत सिर मुकुट पुरट-निरमित मनि रचित चारु, कुंचित कच रुचिर परम, सोभा नहिं थोरी। मनहुँ भँवरीक-पुंज कंजवृन्द प्रीति लागि गुंजत कल गान तान दिनमणि रिझयो री ॥ २ ॥ अरुनकंज दल-बिसाल लोचन, भ्रू-तिलकभाल, मंडित स्रुति कुंडल बर सुंदरतर जोरी। मनहुँ संबरारि मारि, ललित मकर-जुग बिचारि, दीन्हें ससिकहँ पुरारि भ्राजत दुहुँ ओरी ॥ ३ ॥ सुंदर नासा-कपोल, चिबुक, अधर अरुन बोल मधुरे, दसन राजत जब चितवत मुख मोरी। कंज-कोस भीतर जनु कंजराज-सिकर-निकर, रुचिर रचित बिधि बिचित्र तड़ित-रंग-बोरी ॥ ४ ॥ कंबुकंठ उर बिसाल तुलसिका नवीन माल, मधुकर बर-बास-बिबस, उपमा सुनु सो री। मनु कलिंदजा सुनील सैलतें धसी समीप, फेन-वृन्द बरसत छबि मधुर घोरि घोरी ॥ ५ ॥
निरमल अति पीत चेल, दामिनि जनु जलद नील राखी निज सोभाहित बिपुल बिधि निहोरी। नयनन्हिको फल बिसेष ब्रह्म अगुन सगुन बेष, निरखहु तजि पलक, सफल जीवन लेखौ री ॥ ६ ॥ सुंदर सीतासमेत सोभित करुनानिकेत, सेवक सुख देत, लेत चितवत चित चोरी। बरनत यह अमित रूप थकित निगम-नागभूप, तुलसिदास छबि बिलोकि सारद भइ भोरी ॥ ७ ॥ अरी सखिया ! मुनियोंके मनोंको हरनेवाले तथा शरणके योग्य सुखदायक राजाधिराजशिरोमणि भगवान् रामकी ओर तो देखो। वे सम्पूर्ण लोकोंके नेत्रोंको आनन्दित करनेवाले, नीलमणि और तमाल वृक्षके समान श्यामवर्ण तथा रूप और शीलके आश्रय हैं। उन- के अङ्ग-प्रत्यङ्गोंमें जो छवि है उसके आगे कामदेव भी क्या है ?॥१॥ उनके सिरपर अति सुन्दर मणिजटित सुवर्णमय मुकुट शोभायमान है तथा उनके नीचे अति मनोहर कुटिल अलकावली है। उसकी शोभा भी कुछ कम नहीं है। [ वे ऐसे मालूम होते हैं ] मानो [मुख एवं नेत्ररूप] कमलोंकी प्रसन्नताके लिये गूंजते हुए भौरोंने अपने सुन्दर गानकी तानसे [मुकुटरूप] सूर्यको रिझा लिया हो ॥ २ ॥ उनके नेत्र अरुण कमलदलके समान विशाल हैं, माथेपर भ्रुकुटि तथा तिलक शोभायमान हैं तथा कानोंमें श्रेष्ठ कुण्डलोंकी अत्यन्त सुन्दर जोड़ी सुशोभित है, मानो श्रीमहादेवजीने कामदेवको मार उसकी ध्वजाके दो मकरोंको सुन्दर जान उन्हें (मुखरूप) चन्द्रमाको दे दिया हो और वे उसके दोनों ओर शोभायमान हों ॥ ३ ॥ प्रभुकी नासिका, कपोल, ठोढ़ी और अरुण अधर बड़े ही