गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगीतावली ३८४ सुंदर पटपीत बिसद, भ्राजत बनमाल उरसि, तुलसिका-प्रसून-रचित, बिबिध-बिधि बनाई। तरु-तमाल अधबिच जनु त्रिबिधि कोरपाँति-रुचिर, हेमजाल अंतर परि तातें न उड़ाई॥ ५ ॥ संकर-ह्रद-पुंडरीक निसि बस. हरि-चंकरीक, निर्व्यलोक-मानस-गृह संतत रहे छाई। अतिसय आनंदमूल तुलसिदास सानुकूल, हरन सकल सूल, अवध-मंडन रघुराई॥ ६ ॥ अरी माई ! कमलनयन महाराज रघुनाथजी करोड़ों कामदेवों- के समान सुन्दर शरीरवाले, करुणा-रसके आगार और आनन्दस्वरूप हैं। सखि ! देखो, उनकी अतुलित छवि साधु-समाजरूप कमलवन- के लिये सूर्यस्वरूप है और उनकी पवित्र कीर्ति कवि तथा विद्वत्समुदाय गान करते हैं॥ १॥ अहा ! रघुवंशवीर श्रीरामचन्द्रजी स्नान करनेके अनन्तर सरयूतटपर खड़े हैं। उनके चरणकमलोंको मनस्वी भक्तगण अपना निर्मल चित्त लगाकर सेवन कर रहे हैं। इस प्रकार सम्पूर्ण लोकोंके नेत्रोंको आनन्दित करनेवाले आनन्दधाम चन्द्रवदन भगवान् राम ब्राह्मणसमाज तथा मुनीन्द्रमण्डलीके मध्यमें विराजमान हैं॥ २॥ उनकी कुञ्चित अलकावली बिथुरी हुई है, जिनके बीच-बीचमें फूलोंके गुच्छे लगे हैं। वे ऐसे मालूम होते हैं मानो मणियोंके सहित बालसर्पोंका समुदाय चन्द्रमाके समीप आया हो और उसे देखकर चन्द्रमाने भयभीत होकर उससे बचनेके लिये दो मनोहर मोरोंको फुसलाकर रख छोड़ा हो और उन (मोररूप) कुण्डलोंकी छवि देखकर वे (सर्परूप) चोर अत्यन्त सकुचाते हों।