गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३८३ उत्तरकाण्ड अँगड़ाने लगा। उनके कुछ उनीदे-से मनोहर नेत्र तथा मुखकी प्रतिभा और शृङ्गार देखकर अनेकों कामदेव भी हार मानकर भाग गये ॥ २ ॥ उनकी छवि स्वभावसे ही शोभामयी है, उसकी उपमा कोई भी कवि नहीं पा सकता; अतः वे प्रसन्नतापूर्वक उसकी ओर देखते रहते हैं। तुलसीदास कहते हैं, इस प्रकार वे अहर्निश प्रभु- के अनूप रूपके प्रेममें मग्न रहते हैं ॥ ३ ॥ राग कल्याण [ ३ ] रघुपति राजीवनयन सोभातन, कोटि मयन, करुनारस-अयन अयन-रूप भूप, माई। देखो सखि-अतुलित छवि, संत-कंज-कानन रवि, गावत कल कीरति कबि-कोबिद-समुदाई ॥ १ ॥ मज्जन करि सरजुतीर ठाढ़े रघुबंसबीर, । सेवत पदकमल धीर निरमल चित लाई। ब्रह्ममंडली-मुनींद्रबृंद-मध्य इंदुबदन राजत सुखसदन लोकलोचन-सुखदाई ॥ २ ॥ बिथुरित सिररुह बरूथ कुंचित, बिच सुमन-जूथि, मनिजुत सिसु-फनि-अनेक ससि समीप आई। जनु सभीति दै अँकोर राखे जुग रुचिर मोर, कुंडल-छवि निरखि चोर सकुच अधिकाई ॥ ३ ॥ ललित भ्रुकुटि, तिलक भाल, चिबुक-अधर-द्विज रसाल, हास चारुतर, कपोल, नासिका सुहाई। मधुकर जुग पंकज बिच, सुक बिलोकि नीरजपर लरत मधुप-अवलि मानो बीच कियो जाई ॥ ४ ॥