भारतकोश
गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

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पृष्ठ 388

गीतावली ३८२ पृथ्वी कामधेनुरूपा हो गयी, वृक्ष साक्षात् कल्पतरु हो गये और पत्थर मणि तथा लाल आदि हो गये । इस प्रकार उस समय सभी स्त्री, पुरुष पुण्यवान् एवं भाग्यशाली थे ॥ ३ ॥ वे अपने-अपने वर्णाश्रमधर्मोंमें तत्पर, मन, वचन और वेषसे हंसके समान स्वच्छ- पवित्र, राम और सीताके सेवक, प्रेमी, साधुचरित, प्रसन्नवदन एवं विनम्र थे ॥ ४ ॥ भगवान् रामके राजसमाजका तो सिद्ध, देवता और दिग्पालगण भी बखान किया करते थे । तुलसीदासजी कहते हैं, उसकी बातोंको याद करके हृदयमें आज भी अत्यन्त आनन्द होता है ॥ ५ ॥ रामरूप-वर्णन राग ललित [ २ ] भोर जानकी जीवन जागे । सूत-मागध प्रबीन, बेनु-बीना-धुनि द्वारे, गायक सरस राग रागे । १ । स्यामल सलोने गात, आलसबस जँभात प्रिया प्रेमरस पागे । उनींदे लोचन चारु, मुख-सुखमा-सिंगार हेरि हारे मार मूरि भागे २ सहज सुहाई छबि, उपमा न लहैं कबि, मुदित, बिलोकन लागे । तुलसिदास निसिबासर अनूप रूप रहत प्रेम-अनुरागे ॥ ३ ॥ प्रातःकाल होते ही जानकी जीवन भगवान् राम जागे । उस समय सुचतुर सूत और मागधोंने विरदावली कहना आरम्भ कर दिया, द्वारपर बाँसुरी और वीणाकी ध्वनि होने लगी तथा गायकोंने सरस राग अलापना आरम्भ कर दिया ॥ १ ॥ भगवान्‌का अति सुन्दर श्याम शरीर प्रियाके प्रेमरसमें पगकर आलस्यके कारण