गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंॐ श्रीसीतारामभ्यां नमः गीतावली —★★— उत्तरकाण्ड रामराज्य राग सोरठ [ १ ] बनतें आइकै राजा राम भए भुआल । मुदित चौदह भुअन, सब सुख सुखी सब सब काल ॥ १ ॥ मिटे कलुष-कलेस-कु लषन, कपट-कुपथ-कुचाल । गए दारिद, दोष दारुन, दंभ-दुरित-दुकाल ॥ २ ॥ कामधुक महि, कामतरु तरु, उपल मनिगन लाल । नारि-नर तेहि समय सुकृति, भरे भाग सुभाल ॥ ३ ॥ बरन-आश्रम-धरमरत, मन बचन बेष मराल । राम-सिय-सेवक-सनेही, साधु, सुमुख, रसाल ॥ ४ ॥ राम-राज-समाज बरनत सिद्ध-सुर-दिगपाल । सुमिरि सो तुलसी अजहुँ हिय हरष होत बिसाल ॥ ५ ॥ बनसे आकर महाराज राम भूपति हुए। उनके राज्यमें चौदहों भुवन आनन्दित हो गये और सब लोग सब समय सब प्रकारके सुखोंसे सुखी रहने लगे ॥ १ ॥ सब प्रकारके पाप, क्लेश, कुलक्षण, कपट, कुमार्ग और कुचाल नष्ट हो गये तथा दरिद्रता, दारुण दोष, दम्भ, दुरित और दुष्काल आदिका नाम मिट गया ॥ २॥