भारतकोश
गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

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पृष्ठ 386

गीतावली ३८० राम-तिलक सुनि दीप दीपके नृप आए उपहार लिये। सोयसहित आसीन सिंहासन निरिख जोहारत हरष हिये ॥ ३ ॥ मंगलगान, बेदधुनि, जयधुनि, मुनि-आसीस-धुनि भुवन भरे। बरषि सुमन सुर-सिद्ध प्रसंसत, सबके सब संताप हरे ॥ ४ ॥ राम-राज भइ कामधेनु महि, सुख संपदा लोक छाए। जनम जनम जानकीनाथके गुनगन तुलसिदास गाये ॥ ५ ॥ महाराज राम शत्रुको युद्धमें जीतकर आये हैं; इसलिये आज अयोध्यामें आनन्दमय बधावा हो रहा है। देवतालोग अपने सुन्दर विमान सजाकर प्रसन्नतापूर्वक बाजे बजाते उन्हें देखनेके लिये दौड़े आ रहे हैं ॥ १ ॥ घर-घरमें चन्दन और मणियोंके सुन्दर चौक पूरे गये हैं, सबने मङ्गलकलश तथा ध्वजा, पताका, तोरण और अच्छे- अच्छे चँदोवे सजाये हैं तथा जगह-जगह तरह-तरहके बाजे बज रहे हैं ॥ २ ॥ रामचन्द्रजीके राज्याभिषेकका समाचार सुनकर द्वीप- द्विपान्तरोंके राजालोग उपहार लिये आये हैं, और भगवान् रामको सीताजीके सहित सिंहासनपर बैठे देख हृदयमें हर्षित होकर जुहारते हैं ॥ ३ ॥ सारे भुवन मङ्गलगान, वेदध्वनि, जयघोष और मुनीश्वरोंके आशीर्वादात्मक शब्दोंसे भरे हुए हैं। देवता और सिद्धलोग पुष्प बरसाकर भगवान्की प्रशंसा करते हैं तथा भगवान्ने भी सबके सभी दुःख दूर कर दिये हैं ॥ ४ ॥ भगवान् रामके राज्यमें पृथ्वी कामधेनुरूपा हो गयी है और सम्पूर्ण लोक सुख एवं सम्पत्तिसे छा गये हैं। तुलसीदासने भी जन्म-जन्ममें श्रीसीतापतिके ही गुणगणका गान किया है ॥ ५ ॥