भारतकोश
गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

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पृष्ठ 385

३७१ लंकाकाण्ड खूब आदर किया और उन्हें अच्छी तरह अपनाया ॥ ६ ॥ फिर याचकोंको, उनकी रुचि देख-देखकर दान और मानसे सन्तुष्ट किया तथा उन्हें वस्त्रादि पहनाये । इससे उनके शोकरूप सरोवर सूख गये तथा आनन्दरूप नदी और समुद्र गम्भीर हो गये ॥ ७ ॥ प्रभुके प्रतापरूप सूर्यके सामने अहित, अमङ्गल और पापरूप उल्लू तथा अन्धकार लीन हो गये, सुहृद्रूप कोक (चकवा-चकवी) एवं कोकनद (कमल) शोकहीन हो गये तथा सम्पूर्ण लोकोंमें उनका सुयश छा गया ॥ ८ ॥ रामचन्द्रजीके राज्यमें सारे लौकिक कार्य मङ्गलमय रहे, सबको सब प्रकारके सुख प्राप्त हुए तथा ब्राह्मण लोग प्रसन्नतापूर्वक आशीर्वाद देकर प्रजाका आनन्द बढ़ाते रहे ॥ ९ ॥ भगवान् श्रीरामने आश्रमधर्मका विभाग कर लोगोंको पवित्र वेदमार्गपर प्रवर्तित किया । सब लोग धर्मपरायण तथा राम और सीताके चरणोंमें प्रीति करनेवाले थे, मानो साक्षात् राम और सीतासे ही उत्पन्न हुए हों ॥ १० ॥ पृथिवी कामधेनुरूप तथा वृक्ष कल्पतरुके समान हो गये; विधाता किसीके प्रति विपरीत नहीं रहा । तुलसी- दासजी कहते हैं, यह तो उस समयके लोगोंकी बात है, किन्तु इस समय भी जिन्होंने प्रीतिपूर्वक रघुनाथजीके गुण गाये हैं, उन्हें वही आनन्द प्राप्त हुआ है ॥ ११ ॥ राग टोड़ी [ २३ ] आजु अवध आनंद-बधावन, रिपुरन जीति राम आए । सजि सुबिमान निसान बजावत मुदित देव देखन धाए ॥ १ ॥ घर घर चारु चौक चंदन-मनि, मंगल-कलस सबनि साजे । ध्वज-पताक, तोरन, बितानबर, बिबिध भांति बाजन बाजे ॥ २ ॥