गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगीतावली ३७८ रामराज कुलकाज सुमंगल, सबनि सबै सुख पाए। देहिं असीस भूमिसुर प्रमुदित, प्रजा प्रमोद बढ़ाए ॥ ९ ॥ आश्रम-धरम-बिभाग बेदपथ पावन लोग चलाए। धरम-निरत, सिय-राम-चरन-रत, मनहु राम-सिय-जाए ॥ १० ॥ कामधेनु महि, बिटप कामतरु, कोउ बिधि बाम न लाये। ते तब, अब तुलसी तेउ जिन्ह हित सहित राम-गुन गाये ॥ ११ ॥ महाराज राम युद्ध जीतकर भाई, सेना और सीताके सहित सकुशल आ गये हैं। इसलिये आज अयोध्यामें आनन्दोत्सव हो रहा हैं ॥ १ ॥ उन्होंने शत्रुके नगरको उजाड़ और जलाकर तथा शत्रु- को मारकर देवताओंके घरोंको बसाया है। पृथ्वी, गौ, ब्राह्मण और साधु, इन सबके सभी शोक नष्ट कर दिये हैं ॥ २ ॥ विभीषणको लंका देकर उन्हें स्थिरतापूर्वक राज्याभिषिक्त कर वचनरूप अमृत पिलाया है और (युद्धमें मरे हुए) वानरोंको अमृतसे सींचकर जीवित कर अब अयोध्याके नर-नारियोंको कृपादृष्टिसे निहारकर जीवन-दान दिया है ॥ ३ ॥ गुरु, भाई, माता, सेवक और कुटुम्बीलोग प्रभुसे मिले, इससे उन सबकी सभी मनःकामनाएँ पूर्ण हो गयीं और प्रभुके दर्शनके आनन्दमें वे चौदह वर्षके दुःखों- को एक पलभरमें भूल गये ॥ ॥ मुनिवर वसिष्ठजीने सुमन्त आदि पवित्रचित्त मन्त्रियोंको बुलाकर शुभ दिन शोधकर मंगल-सामग्रियाँ एकत्र करायीं। भगवान् रामके राज्याभिषेकके समय देवताओंने फूल बरसाकर दुन्दुभी आदि बाजे बजाये ॥ ५ ॥ तथा भूपति, अहिपति और लोकपतियोंने तरह-तरहकी भेंटे ले भगवान्का पूजनकर उन्हें अत्यन्त प्रेमसे सिर नवाये। भगवान् रामने उनका प्रेम पहचानकर