गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३८७ उत्तरकाण्ड. कामदेवोंका मन मोह रही है ॥ १ ॥ उनके सुषमा, शील और आनन्दके भण्डार मनोहर नेत्र देखो तथा काली और घुंघराली अलकें निहारो । अहा ! इनके मनोहर कुण्डल और नासिका तो हमारे चित्तोंको अपनेमें लगाये लेते हैं; मानो चन्द्रबिम्बके मध्यमें कमल, मत्स्य और खञ्जन पक्षीको देखकर उन्हें अपने सजातीय जान भ्रमर, मकर और शुक पक्षी आये हों [यहाँ मुख चन्द्रमण्डल है, नेत्र कमल, मत्स्य और खञ्जन पक्षी हैं, अलकें भ्रमर हैं, कुण्डल मकर हैं तथा नासिका शुक है ] ॥ २ ॥ भगवान्के बड़े ही मनोहर कपोल हैं; अत्यन्त विशाल भालपर तिलक झलक रहा है तथा [मुखचन्द्रपर] चन्द्रमाके चिह्न [मेचकताई] के समान अत्यन्त मनोहर बाँकी भ्रुकुटियाँ हैं। प्रभुके अरुण अधर, सुमधुर बोल, विद्युच्छटाके समान दांतोंकी दमक, मनोहर मुसकान तथा तिरछी चितवन चित्तको उल्लसित कर देती हैं ॥ ३ ॥ भगवान्का कण्ठ शंखके समान है, भुजाएँ लंबी-लंबी हैं तथा हृदयमें मनोहर मुक्ता- वलीके सहित नवीन तुलसीकी माला शोभायमान है । उस छबिको योगिजन हृदयमें इस प्रकार देखते हैं, मानो हंसोंकी पंक्तिके सहित कलिन्दनन्दिनी यमुनाजी इन्द्रनीलमणिके शिखरको स्पर्श करती हुई नीचेको गिरती हुई अत्यन्त शोभा पा रही हों [यहाँ मोतियोंकी माला हंसोंकी पंक्ति है, तुलसीकी माला कालिन्दी है और भगवान्का कंधा इन्द्रनीलमणिका शिखर है] ॥ ४ ॥ अरी आली ! प्रभुका जो महामनोहर नवीन एवं दिव्य दुकूल (उपरना) है वह सुन्दर चम्पक पुष्पोंका समूह तो नहीं है । अथवा वह विद्युत् कलाप किंवा सुवर्णका समूह है । भगवान्का सौन्दर्यसमुद्र शरीर, जो