गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगीतावली ३८८ सत्पुरुषोंके नेत्ररूप मकरोंका निवास-स्थान एवं भूषणरूप रत्नराशिसे सम्पन्न है, हमारे मनरूप मतंगको अपने अन्दर डुबोये लेता है ॥५॥ उस सखीकी यह वाक्चातुरी देखकर तथा तुरीयरूप भगवान् रामको निहारकर सब सखियाँ प्रेममें डूब गयीं। उनके पैर न तो आगे पड़ते थे और न पीछे; उसय सब-की-सब चकित हो रही थीं। तुलसीदासजी कहते हैं, उन्हें यह सुवि न रही कि कौन किसकी है ? कहाँसे आयी है ? उसका क्या काम है ? किसके पास खड़ी है ? और कौन किस जगह है ? ॥ ६ ॥ [ ५ ] देखु सखि ! आजु रघुनाथ-सोभा बनी । नील-नीरद-बरन बपुष भुवनाभरन, पीत-अंबर-धरन हरन दुति-दामिनी ॥ १ ॥ सरजु मज्जन किए, संग सज्जन लिए, हेतु जापर हिये, कृपा कोमल घनी । सजनि ! आवत भवन मत्त-गजवर, गवन, लंक मृगपति ठवनि, कुँवर कोसलधनी ॥ २ ॥ सघन चिककन कुटिल चिकुर बिलुलित मृदुल, करनि बियरत चतुर, सरस सुषमा जनी । ललित अहि-सिसु-निकर मनहु ससि सन समर लरत, घरहरि करत रुचिर जनु जुग फनी ॥ ३ ॥ भाल भ्राजत तिलक, जलज लोचन, पलक, चारु भ्रू, नासिका सुभग सुक-आननी । चिबुक सुंदर, अधर अरुन, द्विज-दुति सुघर, बचन गंभीर, मृदुहास भव-भाननी ॥ ४ ॥