गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगीतावली ३८६ सुखमा-सुख-सील-अयन नयन निरखि निरखि नील कुंचित कच, कुंडल कल, नासिका चित पोहैं। मनहु इंदुबिंब मध्य कंज-मीन-खंजन लखि मधुप-मकर-कीर आए तकि तकि निज गौहैं॥ २ ॥ ललित गंड-मंडल, सुबिसाल भाल तिलक झलक मंजुतर मयंक-अंक, रुचिर बंक भौंहैं। अरुन अधर मधुर बोल, दसन-दमक दामिनि दुति, हुलसति हिय हँसनि चारु, चितवन तिरछैहैं। ३ ॥ कंबुकंठ, भुज बिसाल उरसि तरुन तुलसिमाल, मंजुल, मुकतावलि जुत जागति जिय जोहैं। जनु कलिंद-नंदनि मनि-इन्द्रनील-सिखर परसि धँसति लसति हंससेनि-संकुल अधिकौहैं॥ ४ ॥ दिब्यतर दुकूल भव्य नब्य रुचिर चंपक चय, चंचला-कलाप, कनक-निकर अलि ! किधौं हैं। सज्जन-चष-झष-निकेत, भूषन-मनिगन समेत, रूप-जलधि-बपुष लेत मन-गयंद बोहैं॥ ५ ॥ थकनि बचन-चातुरी, तुरीय पेखि प्रेम-मगन पग न परत इत उत, सब चकित तेहि समो हैं। तुलसिदास यह बुधि नहि कौनकी, कहाँतें आई, कौन काज, काके ढिग कौन ठाउ को हैं॥ ६ ॥ 'अरी सखि ! देख, संसारके दुःखको दूर करने सर्वतापा- पहारी धीर-वीर रघुनाथजी सरयूतटपर शोभायमान हैं। उनके साथ छोटे भाई और बहुत-से लोग-बाग हैं, वे स्वयं भी शत्रुओंकी सेनाको छिन्न-भिन्न करनेवाले हैं तथा उनके अङ्ग-अङ्गकी शोभा अगणित