भारतकोश
गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

पृष्ठ 400, कुल 454 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 400

निरमल अति पीत चेल, दामिनि जनु जलद नील राखी निज सोभाहित बिपुल बिधि निहोरी। नयनन्हिको फल बिसेष ब्रह्म अगुन सगुन बेष, निरखहु तजि पलक, सफल जीवन लेखौ री ॥ ६ ॥ सुंदर सीतासमेत सोभित करुनानिकेत, सेवक सुख देत, लेत चितवत चित चोरी। बरनत यह अमित रूप थकित निगम-नागभूप, तुलसिदास छबि बिलोकि सारद भइ भोरी ॥ ७ ॥ अरी सखिया ! मुनियोंके मनोंको हरनेवाले तथा शरणके योग्य सुखदायक राजाधिराजशिरोमणि भगवान् रामकी ओर तो देखो। वे सम्पूर्ण लोकोंके नेत्रोंको आनन्दित करनेवाले, नीलमणि और तमाल वृक्षके समान श्यामवर्ण तथा रूप और शीलके आश्रय हैं। उन- के अङ्ग-प्रत्यङ्गोंमें जो छवि है उसके आगे कामदेव भी क्या है ?॥१॥ उनके सिरपर अति सुन्दर मणिजटित सुवर्णमय मुकुट शोभायमान है तथा उनके नीचे अति मनोहर कुटिल अलकावली है। उसकी शोभा भी कुछ कम नहीं है। [ वे ऐसे मालूम होते हैं ] मानो [मुख एवं नेत्ररूप] कमलोंकी प्रसन्नताके लिये गूंजते हुए भौरोंने अपने सुन्दर गानकी तानसे [मुकुटरूप] सूर्यको रिझा लिया हो ॥ २ ॥ उनके नेत्र अरुण कमलदलके समान विशाल हैं, माथेपर भ्रुकुटि तथा तिलक शोभायमान हैं तथा कानोंमें श्रेष्ठ कुण्डलोंकी अत्यन्त सुन्दर जोड़ी सुशोभित है, मानो श्रीमहादेवजीने कामदेवको मार उसकी ध्वजाके दो मकरोंको सुन्दर जान उन्हें (मुखरूप) चन्द्रमाको दे दिया हो और वे उसके दोनों ओर शोभायमान हों ॥ ३ ॥ प्रभुकी नासिका, कपोल, ठोढ़ी और अरुण अधर बड़े ही