गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३६३ उत्तरकाण्ड शुकदेवजीने भी जिनके भक्तिभावको ही दृढ़ करके पकड़ा है, उन भगवान् रामके चरणकमलोंमें तुलसीदास मन, वचन और कर्मसे सदा प्रीति ही निर्वाह चाहता है ॥ ६ ॥ [ ७ ] राव राजराजमौलि मुनिवर-मन-हरन, सरन- लायक, सुखदायक रघुनायक देखी री। लोक-लोचनाभिराम, नीलमणि-तमाल-स्याम, रूप-सील-धाम, अंग छबि अनंग को री ? ॥ १ ॥ लसत सिर मुकुट पुरट-निरमित मनि रचित चारु, कुंचित कच रुचिर परम, सोभा नहिं थोरी। मनहुँ भँवरीक-पुंज कंजवृन्द प्रीति लागि गुंजत कल गान तान दिनमणि रिझयो री ॥ २ ॥ अरुनकंज दल-बिसाल लोचन, भ्रू-तिलकभाल, मंडित स्रुति कुंडल बर सुंदरतर जोरी। मनहुँ संबरारि मारि, ललित मकर-जुग बिचारि, दीन्हें ससिकहँ पुरारि भ्राजत दुहुँ ओरी ॥ ३ ॥ सुंदर नासा-कपोल, चिबुक, अधर अरुन बोल मधुरे, दसन राजत जब चितवत मुख मोरी। कंज-कोस भीतर जनु कंजराज-सिकर-निकर, रुचिर रचित बिधि बिचित्र तड़ित-रंग-बोरी ॥ ४ ॥ कंबुकंठ उर बिसाल तुलसिका नवीन माल, मधुकर बर-बास-बिबस, उपमा सुनु सो री। मनु कलिंदजा सुनील सैलतें धसी समीप, फेन-वृन्द बरसत छबि मधुर घोरि घोरी ॥ ५ ॥