भारतकोश
गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

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पृष्ठ 398

गीतावली ३६२ आज रघुनाथजीकी छविका कुछ वर्णन नहीं किया जाता। वे त्रिभुवनसुन्दरसीतारमण भगवान् राम सुन्दर सिंहासनपर विराजमान हैं। वे सचमुच अनेकों कामदेवोंके समान शोभा सम्पन्न हैं॥ १ ॥ सुन्दर चँवर, व्यजन, छत्र, अनेकों मणिगण तथा मुक्तामालाओंकी लड़ियोंकी ज्योति जगमगा रही है, मानो अपने प्रभुको हृदयमें पहचानकर [छत्ररूप] चन्द्रमाके सहित [चँवररूप] हंस [मणिगणरूप] तारे और [व्यजनरूप] मोर श्रीरघुनाथजीसे मिलनेके लिये आये हैं॥ २ ॥ प्रभुके सिरपर सुन्दर मुकुट है, ललित ललाटपर तिलक और भ्रुकुटियाँ शोभायमान हैं तथा घुँघराली अलकोंके पास कुण्डलोंकी बड़ी शोभा हो रही है। वे ऐसे जान पड़ते हैं, मानों कामदेवकी ध्वजाके दो मकर भगवान् शंकरके भयसे [प्रभुको उनके स्वामी जान] कानोंसे लगाकर मेलकी बातचीत कर रहे हैं॥ ३ ॥ भगवान्‌के अरुण कमलदलके समान नेत्र करुणाके भण्डार हैं। उनका मुख सुषमाका आश्रय तथा हास तीनों तापोंको नष्ट करनेवाला है। वे हाथोंमें तरह-तरहके कंकण तथा हृदयमें हार और गजमुक्ताओंकी माला धारण किये हैं, मानो दो बगुलोंकी पंक्तियाँ मिलकर मेघकी ओर जा रही हों ॥ ४ ॥ वे अति स्वच्छ पीताम्बर धारण किये हैं, मानो मरकतमणिके पर्वतपर बहुत-सी बिजली अपने स्वभावको छोड़कर छायी हुई हों। उनके हाथोंमें सुन्दर धनुष-बाण हैं तथा पुष्ट भुजाओंमें अतुलित बल है। उनका यह मनुष्य-शरीर दैत्यवनको जलानेवाला तथा पृथ्वीका आभूषण है । ५ ॥ जो निर्गुण होते हुए भी सगुण हैं तथा जिनके गुण और रूपोंकी कोई गणना नहीं कर सकता; अतः शिव, सनकादि तथा