गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३६५ उत्तरकाण्ड सुन्दर हैं तथा उनके बोल अत्यन्त मीठे हैं। जिस समय वे मुख मोड़कर निहारते हैं, उस समय उनके दाँत ऐसे शोभायमान होते हैं जैसे किसी कमलकोशके भीतर विधाताद्वारा बिजलीके रंगमें डुबोकर रचे हुए अतिसुन्दर पद्मरागके शिखर विराजते हों॥ ४॥ अरी सखि! प्रभुके कम्बुकण्ठ तथा विशाल वक्षःस्थलपर जो नवीन तुलसीकी माला है और उसकी सुहावनी सुगन्धके वशीभूत होकर उसपर जो भौंरे गुंजार रहे हैं, उनकी उपमा तो सुन । [ वे ऐसे जान पड़ते हैं] मानो किसी नीलशिखरसे गिरी हुई कालिन्दीके समीप मेघवृन्द गरज-गरजकर मधुर छवि बरसा रहे हों [यहाँ भगवान्का श्याम शरीर नीलशिखर है, तुलसीकी माला कालिन्दी है, उसपर गुंजारते हुए भौंरे मेघ हैं, उनका शब्द गर्जन है तथा उनके मुखसे जो फूलोंका पराग झड़ता है वही छविकी वर्षा करता है] ॥ ५ ॥ प्रभुके श्याम शरीरपर अत्यन्त निर्मल पीताम्बर सुशोभित है, मानो किसी नीलमेघने अपनी शोभाके लिये बहुत अनुनय-विनय करके बिजलीको रख छोड़ा हो। अरी ! इस सगुण वेषमें प्रकट हुआ यह निर्गुण ब्रह्म नेत्रोंका परम लाभ है, तुम पलक मारना छोड़कर इसे देखो और अपने जीवनको सफल हुआ समझो ॥ ६ ॥ देखो, सुन्दरी सीताके सहित शोभायमान करुणाधाम भगवान् राम अपने सेवकोंको सुख देते हैं और अपनी दृष्टि डालते ही चित्तको चुरा लेते हैं। तुलसीदासजी कहते हैं, इस अमित रूपका वर्णन करते-करते श्रुति और शेषजी भी थकित हो गये हैं तथा इनकी छविको देखकर शारदाकी बुद्धि भी चकित हो गयी है ॥ ७॥