भारतकोश
गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

पृष्ठ 402, कुल 454 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 402

गीतावली ३६६ राग केदारा [ ८ ] सखि ! रघुनाथ-रूप निहारु । सरद-बिधु रवि-सुवन मनसिजमानभंजनिहारु ॥ १ ॥ स्याम सुंदर सरीर जन-मन-काम-पूरनिहारु । बासचंदन मनहु मरकत-सिखर लसत निहारु ॥ २ ॥ रुचिर उर उपवीत राजत पदिक गजमनि-हारु । मनहु सुरधनु नखतगन बिच तिमिर-भंजनिहारु ॥ ३ ॥ विमल पीत दुकूल दामिनि-दुति-विनिंदनिहारु । बदन सुषमासदन सोभित मदन-मोहनिहारु ॥ ४ ॥ सकल अंग अनूप, नहिं कोउ सुकवि बरननिहारु । दासतुलसी निरखतहि सुख लहत निरखनिहारु ॥ ५ ॥ अरी सखि ! भगवान् रामका शरच्चन्द्र, अश्विनीकुमार तथा कामदेवका मान-मर्दन करनेवाला रूप देख ॥ १ ॥ भक्तोंकी मनो- कामना पूर्ण करनेवाले भगवान्‌के श्यामसुन्दर शरीरपर जो चन्दनका लेप हो रहा है, वह ऐसा जान पड़ता है, मानो मरकतमणिके शिखरपर कुहरा सुशोभित हो ॥ २ ॥ भगवान्‌के मनोहर वक्षःस्थलमें यज्ञोपवीत, पदिक और गजमुक्ताओंका हार शोभायमान है, मानो इन्द्रधनुष और नक्षत्रगणके बीचमें साक्षात् सूर्यदेव विराजमान हों ॥ ३ ॥ प्रभुका निर्मल पीताम्बर बिजलीकी कान्तिका तिरस्कार करनेवाला है तथा उनका सौन्दर्यपूर्ण मुखमण्डल कामदेवको भी मोहित करनेवाला है ॥ ४ ॥ भगवान्‌के सभी अङ्ग अनुपम हैं । उनका वर्णन कर सकनेवाला कोई सुकवि नहीं है । तुलसीदासजी