गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
पृष्ठ 403, कुल 454 में से
संदर्भ में पढ़ें३६७ उत्तरकाण्ड कहते हैं, उसका दर्शन करनेवाले उसे देखते ही सुखी हो जाते हैं॥५॥ 【 ९ 】 सखि ! रघुबीर-मुखछबि देखु । चित्त-भीति सुप्रीति-रंग सुरूपता अवरेख ॥ १ ॥ नयन-सुषमा निरखि नागरि ! सफल जीवन लेखु । मनहुँ बिधि जुग जलज बिरचे ससि सुपूरन मेखु ॥ २ ॥ भ्रुकुटि भाल बिसाल राजत रुचिर-कुंकुम-रेखु । अमर द्वै रबिकिरनि ल्याए करन जनु उनमेखु ॥ ३ ॥ सुमुखि ! केस सुदेस सुंदर सुमन, संजुत पेखु । मनहुँ उडुगन-निबह आए मिलन तम तजि द्वेषु ॥ ४ ॥ श्रवन कुण्डल मनहु गुरु-कबि करत बाद बिसेषु । नासिका, द्विज, अधर जनु रह्यो मदनु करि बहु बेषु ॥ ५ ॥ रूप बरनि न सकत नारद-संभु, सारद-सेषु । कहै तुलसीदास क्यों मतिमंद सकल मरेषु ॥ ६ ॥ अरी सखि ! तू रघुनाथजीके मुखकी छवि देख । तू उनकी उस सुन्दरताको अपनी चित्तरूप भित्तिपर सम्यक् प्रीतिरूप रंगसे अंकित कर ले ॥ १ ॥ अरी आली ! प्रभुके नेत्रोंकी सुन्दरता देख- कर तू अपने जीवनको सफल जान । वे तो ऐसे जान पड़ते हैं, मानो मेषराशिके पूर्णिमाके चन्द्रमामें विधाताने दो कमल बना दिये हों ॥ २ ॥ भगवान्के भ्रुकुटियुक्त विशाल भालपर कुंकुमकी रेखाएँ [तिलक] शोभायमान हैं, मानो भ्रमरगण [नेत्ररूप कमलोंके विकासके लिये ] सूर्यकी दो किरणें ले आये हों ॥ ३ ॥ अरी सुमुखि ! प्रभुके मनोहर मस्तकपर सुन्दर फूलोंके सहित उनका