गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगीतावली ३६८ केशकलाप देख, मानो [पुष्परूप] तारे [केशरूप] अन्धकारसे द्वेष त्यागकर मिलनेके लिये आये हैं ॥ ४ ॥ उनके कानोंमें जो कुण्डल हैं वे ऐसे जान पड़ते हैं मानो बृहस्पति और शुक्र विशेष वाद- विवाद कर रहे हों तथा नासिका, दाँत और अधर तो ऐसे शोभायमान हैं मानो कामदेव ही कई प्रकारके वेष बनाकर बस गया हो ॥ ५ ॥ प्रभुके रूपका तो श्रीशंकर, शेष, शारदा और नारद भी वर्णन नहीं कर सकते; फिर सम्पूर्ण मन्दमतियोंका राजा [अत्यन्त मन्दमति] तुलसीदास ही उसे किस प्रकार कह सकता है ? ॥ ६ ॥ राग जैतश्री [ १० ] देखौ, राघव-बदन बिराजत चारु । जात न बरनि, बिलोकत ही सुख, मुख किधौं छबिबर नारि सिंगारु रुचिर चिबुक, रद-ज्योति अनूपम, अधर अरुन सित हास निहारु । मनो ससिकर बस्यो चहत कमल महँ प्रगटत, दुरत, न बनत बिचारु नासिक सुभग मनहुँ सुक सुंदर चितवत चकि आचरज अपारु । कल कपोल, मृदु बोल मनोहर रीझि, चित चतुर अपनपौ वारु ॥ नयन सरोज, कुटिल कच, कुण्डल, भ्रुकुटि, सुभाल तिलक सोभा-सारु मनहुँ केतुके मकर, चाप सर गयो, बिसरि भयो मोहित मारु ॥४॥ निगम सेष, सारद, सुक, संकर, बरनत रूप न पावत पारु । तुलसिदास कहै, कहौं, धौं कौन बिधि अति लघुमति जड क्रूर गंवारु देखो, रघुनाथजीका सुन्दर मुखमण्डल कैसा शोभायमान है। इसका वर्णन नहीं किया जा सकता, इसे देखनेसे ही बड़ा आनन्द प्राप्त होता है । यह मनोहर मुख है अथवा छबिरूप सुन्दरी स्त्रीका शृंगार है ॥ १ ॥ प्रभुकी ठोड़ी सुन्दर है तथा दांतोंकी ज्योति