गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगीतावली ३६६ हनूमान्जी भरत और शत्रुघ्नको देखकर बड़े विस्मित हुए । वे सोचने लगे—क्या राम और लक्ष्मण युद्धमें विजय प्राप्तकर अयोध्यामेंआ गये हैं या मुझे भ्रम होरहा है ? अथवा यहकिसीने कपट किया है ॥१॥ फिर उन्हें पहचानकर उन्होंने प्रेमसे पुलकित हो उनके चरणकमलोंमें प्रणाम किया । उस समय उन्हें दोनों भाइयोंने जैसे प्रेमसे हृदयसे लगाया, वह कहा नहीं जाता ॥ २ ॥ फिर उन्हें सारे समाचार सुनाकर कहा—'मुझे विलम्ब हो रहा है।' वे सब बातें सुनकर भरतजी दुःखसे संतप्त हो गये और बोले—'तुम पर्वतसहित मेरे बाणपर चढ़ जाओ, मैं तुरन्त ही तुम्हें रघुनाथजीके प'स भेज दूंगा !' यह सुनकर हनुमान्जीके हृदयमें गुप्तरूपसे गर्वका आविर्भाव हुआ ॥ ३ ॥ [वे उनके बाणपर चढ़े और जब देखा कि उनके लिये यह कोई बड़ी बात नहीं है । ] तो उससे उतरकर उनका सुयश कहना चाहा । भरतजीके गुणोंने उन्हें जीतलिया । उनकामन अनुराग- में डूब गया तथा 'भरतजी धन्य हैं, भरतजी धन्य हैं, इस प्रकार कहते हुए प्रेममें मग्न होकर वे चुप रह गये ॥४॥ तुलसीदासजी कहते हैं, इस समुद्रको तो [सगर-पुत्रोंने] खोदा है, [देवता और दैत्योंने] मथा है, [हनूमान्जीने] लांघा है, [नल-नीलने बांधा है और [अस्त्यजीने] पिया है; किन्तु रघुनाथजीके भाई भरतजीकी महिमाके समुद्रको तरकर भला कौन कवि पार गया है ? ॥ ५ ॥ [ १२ ] होतो नहि जौ जग जनम भरतको । तौ, कपि कहत, कृपान-धार मग चलि आचरत बरत को ? ॥ १ ॥