भारतकोश
गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

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पृष्ठ 373

३६७ लंकाकाण्ड धीरज-धरम धरनिधर-धुरहूँतें गुर धुर धरनि धरत को ? सब सदगुन सन्मानि आनि उर, अघ-ओगुन निदरत को ? ॥ २ ॥ सिवहु न सुगम सनेह रामपद सुजननि सुलभ करत को ? सृजि निज जस-सुरतरु तुलसीकहँ, अभिमतफरनि फरतको ? ॥ ३ ॥ हनूमान्‌जी कहने लगे—यदि संसारमें भरतजीका जन्म न हुआ होता तो खाँड़की धाररूप इस दुर्गम मार्गमें चलकर प्रेमव्रतका कौन आचरण करता ? ॥ १ ॥ पृथिवीमें पर्वतोंके भारसे भी भारी धैर्य और धर्मका बोझा कौन उठाता ? सब सद्‌गुणोंको सम्मानपूर्वक हृदयमें धारण कर कौन पाप और अवगुणोंका निरादर करता ? ॥ २ ॥ और जो श्रीरामचन्द्रजीके चरणोंका प्रेम शिवजीको भी सुलभ नहीं है, उसे कौन सत्पुरुषोंके लिये सुलभ करता तथा अपने सुयशरूप कल्पवृक्षको रचकर कौन तुलसीदासके लिये अभिमत फल उत्पन्न करता ? ॥ ३ ॥ [ १६ ] सुनि रन घायल लषन परे हैं। स्वामिकाज संग्राम सुभटसों लोहे ललकारि लरे हैं॥ १ ॥ सुवन-सोक, संतोष सुमित्रहि, रघुपति-भगति बरे हैं। छिन-छिन गात सुखात, छिनहिं छिन हुलसत होत हरे हैं॥ २ ॥ कपिसों कहति सुभाय, अँबके अंबक अंबु भरे हैं। रघुनंदन बिनु बंधु कुअवसर, जुद्यपि धनु दुसरे हैं॥ ३ ॥ 'तात ! जाहु कपि संग', रिपुसूवन उठिकर जोरि खरे हैं। प्रमुदित पुलकि पेंत पूरे जनु बिधिबस सुढर ढरे हैं॥ ४ ॥ अंब-अनुजगति लखि पवनज-भरतादि गलानि गरे हैं। तुलसी सब समुझाय मातु तेहिं समय सचेत करे हैं॥ ५ ॥