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गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

३६७ लंकाकाण्ड धीरज-धरम धरनिधर-धुरहूँतें गुर धुर धरनि धरत को ? सब सदगुन सन्मानि आनि उर, अघ-ओगुन निदरत को ? ॥ २ ॥ सिवहु न सुगम सनेह रामपद सुजननि सुलभ करत को ? सृजि निज जस-सुरतरु तुलसीकहँ, अभिमतफरनि फरतको ? ॥ ३ ॥ हनूमान्‌जी कहने लगे—यदि संसारमें भरतजीका जन्म न हुआ होता तो खाँड़की धाररूप इस दुर्गम मार्गमें चलकर प्रेमव्रतका कौन आचरण करता ? ॥ १ ॥ पृथिवीमें पर्वतोंके भारसे भी भारी धैर्य और धर्मका बोझा कौन उठाता ? सब सद्‌गुणोंको सम्मानपूर्वक हृदयमें धारण कर कौन पाप और अवगुणोंका निरादर करता ? ॥ २ ॥ और जो श्रीरामचन्द्रजीके चरणोंका प्रेम शिवजीको भी सुलभ नहीं है, उसे कौन सत्पुरुषोंके लिये सुलभ करता तथा अपने सुयशरूप कल्पवृक्षको रचकर कौन तुलसीदासके लिये अभिमत फल उत्पन्न करता ? ॥ ३ ॥ [ १६ ] सुनि रन घायल लषन परे हैं। स्वामिकाज संग्राम सुभटसों लोहे ललकारि लरे हैं॥ १ ॥ सुवन-सोक, संतोष सुमित्रहि, रघुपति-भगति बरे हैं। छिन-छिन गात सुखात, छिनहिं छिन हुलसत होत हरे हैं॥ २ ॥ कपिसों कहति सुभाय, अँबके अंबक अंबु भरे हैं। रघुनंदन बिनु बंधु कुअवसर, जुद्यपि धनु दुसरे हैं॥ ३ ॥ 'तात ! जाहु कपि संग', रिपुसूवन उठिकर जोरि खरे हैं। प्रमुदित पुलकि पेंत पूरे जनु बिधिबस सुढर ढरे हैं॥ ४ ॥ अंब-अनुजगति लखि पवनज-भरतादि गलानि गरे हैं। तुलसी सब समुझाय मातु तेहिं समय सचेत करे हैं॥ ५ ॥

गीतावली ३६८ जब सुमित्राने सुना कि लक्ष्मणजी युद्धस्थलमें घायल पड़े हैं और उन्होंने अपने स्वामीके लिये विपक्षी योद्धा मेघनादसे रणभूमिमें खूब ललकारकर लोहा भिड़ाया है ॥ १ ॥ तो उन्हें पुत्रकी दशासे तो शोक हुआ और इस बातसे संतोष हुआ कि उन्होंने रघुनाथजी- की भक्तिको स्वीकार किया । उनके अङ्ग एक क्षणमें शोकमें सूख जाते हैं और फिर दूसरे ही क्षणमें आनन्दसे हरे हो जाते हैं ॥ २ ॥ तब माता सुमित्राने नेत्रोंमें जल भरकर, स्वभावसे ही हनूमान्‌जीसे कहा—'रामजी कुअवसरमें भाईसे बिछुड़ गये, यद्यपि धनुष उनके साथ है [जिसके होते हुए उन्हें अन्य किसीकी सहायताकी अपेक्षा नहीं है]' ॥ ३ ॥ [हनूमान्‌जीसे ऐसा कहकर वे शत्रुघ्नजीसे बोली—] 'भैया ! तुम इस हनूमान्‌के साथ जाओ ।' यह सुनते ही शत्रुघ्नजी हाथ जोड़कर खड़े हो गये और शरीरमें पुलकायमान होकर ऐसे प्रसन्न हुए मानो दैवयोगसे उनके पूरे-पूरे दाँव पड़ गये हों ॥ ४ ॥ माता और छोटे भाईकी यह दशा देखकर हनूमान् और भरतजी बड़े ही ग्लानिग्रस्त हो गये । तुलसीदासजी कहते हैं तब माताने उन सबको समझाकर सचेत किया ॥ ५ ॥ [ १४ ] बिनय सुनयनी परि पाय । कहाँ कहा, कपीस ! तुम्ह सुचि, सुमति, सुहृद सुभाय ॥ १ ॥ स्वामि-संकट-हेतु हौं जड़ जननि जनम्यो जाय । समौ पाइ, कहाइ सेवक घट्यो तौ न सहाय ॥ २ ॥ कहत सिथिल सनेह भो, जनु घोर घायल घाय । भरत-गति लखि मातु सब रहि ज्यौं गुड़ी बिनु बाय ॥ ३ ॥

३६६ लंकाकाण्ड भेंट कहि कहिबो, कह्यो यों कठिन-मानस माय । 'लाल ! लोने लषन-सहित सुललित लागत नाँय' ॥ ४ ॥ देखि बंधु-सनेह, अंब सुभाउ, लषन-कुठाय । तपत तुलसी तरनि-त्रासकु एहि नये तिहुँ ताय ॥ ५ ॥ [ भरतजी कहने लगे— ] 'तुम भगवान् रामके पैरों पड़कर मेरी एक विनय सुनाना। हे कपीश्वर ! तुमसे मैं अधिक क्या कहूँ। तुम तो स्वभावसे ही शुद्धचित्त, सुमति और सुहृद् हो ॥ १ ॥ मुझ मूढ़को मेरी माताने प्रभुको कष्ट पहुँचाने के लिये व्यर्थ ही जन्म दिया है, क्योंकि मैं उनका सेवक कहलाकर भी समय उपस्थित होनेपर उनकी सहायता न कर सका' ॥ २ ॥ इस प्रकार कहते-कहते वे स्नेहसे शिथिल हो गये, जैसे कोई धीर पुरुष घावसे घायल हो जानेपर हो जाता है। भरतजीकी यह दशा देखकर सब माताएं इस प्रकार रह गयीं जैसे वायुके बिना पतंग ॥ ३ ॥ [ कौसल्याजी बोलीं— ] भैया ! रामसे भेंट करके कहना कि तुम्हारी कठोरहृदया माताने कहा है—'हे लाल ! तुम्हारा नाम ललित लाल लक्ष्मणके सहित ही सुन्दर मालूम होता है [अतः तुम्हारी शोभा लक्ष्मणके साथ ही लौटनेमें है]' ॥ ४ ॥ तुलसीदासजी कहते हैं, इस प्रकार भाईका स्नेह, माताका स्वभाव और लक्ष्मणजीको मर्माहित देख सूर्यको भी त्रस्त करनेवाले हनूमान्‌जी इन तीनों नये तापोंसे तपने लगे ॥ ५ ॥ [ १५ ] हृदय घाउ मेरे पीर रघुबीरें । पाइ सजीवन, जागि कहत यों प्रेमपुलकि बिसराय सरीरें ॥ १ ॥ मोहि कहा बूझत पुनि पुनि, जैसे पाठ-अरथ-चरचा कीरें । सोभा-सुख, छति-लाहु नृपकहूँ, केवल कांति-मोल हीरें ॥ २ ॥ गी० २४

गीतावली ३७० तुलसी सुनि सौमित्रि-बचन सब धरि न सकत धीरौ धीरै । उपमा राम-लषनकी प्रीतिकी क्यों दीजै खीरै-नीरै ॥ ३ ॥ संजीवनी बूटी खाकर सचेत होनेपर [जब पीड़ा आदिके विषयमें पूछा गया तो ] लक्ष्मणजी ने प्रेमसे पुलकित हो शरीरानु- सन्धानको भूलकर कहा—'मेरे हृदयमें तो केवल घाव ही है, उसकी पीड़ा तो रघुनाथजीको है ॥ १ ॥ जैसे तोतेसे कोई उसके पाठके अर्थकी चर्चा करे, वैसे ही आप लोग बार-बार मुझसे क्या पूछते हैं; हीरेके द्वारा शोभा, सुख तथा हानि या लाभ—ये सब तो राजाको ही होते हैं, हीरेकी तो केवल कान्ति तथा कीमत ही होती है ॥ २ ॥ तुलसीदासजी कहते हैं, लक्ष्मणजी के ये वचन सुनकर बड़े-बड़े धीर भी धैर्य धारण नहीं कर सकते । उन राम और लक्ष्मणके प्रेमकी उपमा दूध और पानीसे भी कैसे दी जाय ? ॥ ३ ॥ विजयी राम राग कान्हरा [ १६ ] राजत राम काम सत-

३७१ लंकाकाण्ड अपने शत्रु रावणको युद्धस्थलमें जीतकर भगवान् राम भाईके साथ विराजमान हैं। इस समय वे सैकड़ों कामदेवोंसे भी सुन्दर जान पड़ते हैं और अपना करकमल धनुष और बाणपर फेर रहे हैं ॥ १॥ उनके श्याम शरीरपर पसीनेकी सुन्दर बूंदें और बीच-बीचमें मनोहर रुधिरकण शोभायमान हैं, मानो किसी मरकतमणिके पर्वत- शिखरपर जुगुनुओंके समूहमें बीरबहूटियाँ शोभा पा रही हों ॥ २ ॥ उनके चारों ओर घायल वीर बैठे हुए हैं। वे सम्पूर्ण रीछ-वानर बड़े ही प्रसन्न हैं। उस समय प्रभु ऐसे जान पड़ते हैं, मानों फूले हुए किंशुक वृक्षोंके बीचमें एक अति विशाल और तरुण तमालवृक्ष हो ॥ ३॥ उस समय कमलनयन भगवान् रामने कृपादृष्टिसे देखकर सब मुनि, नाग, देवता और मनुष्योंको निर्भय कर दिया। तुलसीदासजी कहते हैं, यह दुःसह विपत्तिको दूर करनेवाला अनुपम रूप हमारे हृदयकमलमें विराजमान रहे ॥ ४ ॥ अयोध्यामें प्रतीक्षा राग आसावरी [ १७ ] अवधि आजु किधौं औरो दिन द्वै हैं। चढ़ि धौरहर, बिलोकि दखिन दिसि, बूझ धौं पथिक कहाँते आये वै हैं ॥ १ ॥ बहुरि बिचारि हारि हिय सोचति, पुलकि गात लागे लोचन च्वैहैं। निज बासरनि बरष पुरवंगोबिघ, मेरे वहां कठिन कृत क्वैहैं बन रघुबीर, मातु गृह जीवति, निलज प्रान सुनि सुनि स्वैहैं। तुलसीदास मो-सी कठोर-चित कुलिस सालभंजनि की द्वै हैं ॥ २ ॥

गीतावली ३७२ [जब अवधिके दिन प्रायः बीत चुके तो माता कौसल्याको रामके मिलनेकी बड़ी ही लालसा हुई। उस समय वे कहती हैं—] ‘क्यों जी, अवधि आज ही पूरी होगी या उसका कोई और दिन आवेगा ?’ फिर अपने महलपर चढ़कर दक्षिणकी ओर देखती हुई कहती हैं, ‘देखो पूछो तो, वे पथिक कहाँसे आ रहे हैं ?’ ॥ १ ॥ फिर अवधिमें विलम्ब जान, हृदयमें हार मानकर शोकग्रस्त हो जाती हैं, उनका शरीर पुलकित हो जाता है, नेत्रोंसे जल बहने लगता है [और वे मन-ही-मन कहने लगती हैं—] मालूम होता है, हमने जो कुटिल कर्म किये हैं, उनके परिणाममें विधाता इन चौदह वर्षोंको अपने ही दिनोंके हिसाबसे पूरा करेगा ॥ २ ॥ ‘हाय ! राम वनमें हैं और उनकी माता घरमें रहकर जी रही हैं !’ अब ये निर्लज्ज प्राण इस लोकापवादको सुन-सुनकर सुखकी नींद सोवेंगे ! भला, मुझ-जैसी कठोरचित्त वज्रकी गढ़ी हुई मूर्ति कौन होगी ! ॥ ३ ॥ [ १८ ] आली, अब राम लषन कित ह्वैं हैं। चित्रकूट तज्यौ तबतें न लही सुधि, बधू-समेत कुसल सुत द्वैं हैं १ बारि बयारि, बिषम हिम-आतप सहि बिनु बसन भूमितल स्वैहैं। कंद-मूल, फल-फूल असन बन, भोजन समय मिलत कैसे वैहैं। २ । जिन्हहि बिलोकि सौंचिहैं लता-द्रुम-खग-मृग-मुनि लोचन जल च्वैहैं तुलसीदास तिन्हकी, जननि हौं, मो-सी निठुर-चित औरो कहुँ ह्वैहैं ३ ‘अरी सखि ! इस समय राम और लक्ष्मण किधर होंगे ? जबसे उन्होंने चित्रकूटको छोड़ा है तबसे उनका कोई समाचार नहीं मिला। क्या वधू सीताके सहित मेरे दोनों बालक सकुशल होंगे ? ॥ १ ॥

३७३ लंकाकाण्ड वे वर्षा, वायु तथा भीषण शीत और घाम सहते हुए बिना वस्त्रके ही पृथ्वीपर पड़े रहते होंगे । वनमें कन्द, मूल और फल-फूल आदि ही खानेको मिलते हैं, और वह भोजन भी उन्हें समयपर खानेको कैसे मिलता होगा ? ॥ २ ॥ जिन्हें देखकर लता और वृक्षादिको भी शोक होगा तथा पक्षी, मृग और मुनियोंके नेत्रोंसे जल चूने लगेगा, मैं उन्हींकी माता हूँ ! भला मुझ-जैसी निष्ठुरहृदया भी कोई कहीं होगी ?' ॥ ३ ॥ राग सोरठ [ १९ ] बैठी सगुन मनावति माता । कब ऐहैं मेरे बाल कुसल घर, कहहु, काग ! फुरि बाता ॥ १ ॥ दूध-भातकी दौनी दैहों, सोने चोंच मढ़ैहौं । जब सिय-सहित बिलोकि नयन भरि राम-लषन उर लैहौ ॥ २ ॥ अवधि समीप जानि जननी जिय अति आतुर अकुलानी । गनक बोलाइ, पाँय परि पूछति प्रेम मगन मृदु बानी ॥ ३ ॥ तेहि अवसर कोउ भरत निकटतें समाचार लै आयो । प्रभु-आगमन सुनत तुलसी मनो मीन मरत जल पायो ॥ ४ । माता बैठी-बैठी शकुन मनाती है—'अरे काक ! सच-सच बता, मेरे बालक कुशलपूर्वक कब घर आ जायेंगे ? ॥ १ ॥ जिस समय मैं नेत्र भरकर सीताके सहित राम और लक्ष्मणको देखकर हृदयसे लगाऊँगी, उस समय मैं तुझे दूध-भातका दोना दूँगी और तेरी चोंच सोनेसे मढ़वा दूँगी ॥ २ ॥ फिर वनवासी अवधिको समीप ही जान माता अत्यन्त आतुर होकर हृदयमें व्याकुल हो

गीतावली ३७४ जाती हैं और किसी ज्योतिषीको बुला, उसके पैरों पड़, प्रेममें मग्न होकर मधुर वाणीसे पूछती हैं ॥ ३ ॥ इसी समय भरतजीके पाससे कोई रघुनाथजीके आनेका समाचार लेकर आया । तुलसीदासजी कहते हैं, उसके मुखसे भगवान्‌का आगमन सुनते ही [कौसल्या- जीको ऐसी शान्ति मिली] मानो मरती हुई मछलीको जल मिल गया हो ॥ ४ ॥ राग गौरी [ २० ] क्षेमकरी ! बलि, बोलि सुबानी । कुसल क्षेम सिय-राम-लषन कब ऐहैं, अंब ! अवधरजधानी ॥ १ ॥ ससिमुखि, कुंकुम बरनि, सुलोचन, मोवनि सोचनि बेद बखानी । देवि ! दयाकरि देहि दरसफल, जोरि पानि बिनवहिं सब रानी ॥ २ ॥ सुनि सनेहमय बचन, निकट ह्वैं मंजुल मंडल कै मड़रानी । सुभ मंगल आनंद गगन-धुनि अकनि-अकनि उर-जरनि जुड़ानी ३ फरकन लगे सुअंग बिदिसि दिसि, मन प्रसन्न, दुख-दसा सिरानी । करहिं प्रनाम सप्रेम पुलकि तनु, मानि बिबिध बलि सगुन सयानी ॥४॥ तेहि अवसर हनुमान भरतसों कही सकल कल्यान-कहानी । तुलसीदास सोइ चाह सजीवनि बिषम बियोग व्यथा बड़ि भानी ॥५॥ 'अरी क्षेमकरी (लाल चील) ! मैं बलिहारी जाती हूँ। अरी मैया ! तू अपनी सुन्दर वाणीसे सच-सच बता कि सीता, राम और लक्ष्मण कुशल-क्षेमपूर्वक कब अपनी राजधानी अयोध्याको लौट आवेंगे ? ॥ १ ॥ हे देवि ! तू चन्द्रमाके समान मुखवाली, कुंकुमवर्णा और सुनयना है; वेदोंने तुझे सब प्रकारके शोकोंसे छुड़ानेवाली कहा है। तू दया करके हमें अपने दर्शनोंका

३७५ लंकाकाण्ड फल दे'—इस प्रकार सब रानियाँ हाथ जोड़कर प्रार्थना करती हैं ॥ २ ॥ उनके ये स्नेहपूर्ण वचन सुनकर वह चील उनके पास होकर सुन्दर मण्डल बाँधकर मँड़राने लगी । उस समय आकाश- में उसकी शुभ, आनन्द और मङ्गलमयी ध्वनि सुन-सुनकर उनके हृदयकी तपन शान्त हो गयी ॥ ३ ॥ दिशा-विदिशाओंमें सबके शुभ अङ्ग फड़कने लगे, मन प्रसन्न हो गये और दुःखमयी दशा का अन्त हो गया तथा कौसल्या आदि सुचतुर स्त्रियाँ तरह-तरहकी बलि और शकुन मनाती हुईं प्रेमसे पुलकितशरीर हो अपने इष्टदेवोंको प्रणाम करने लगीं ॥ ४ ॥ इसी समय हनुमान्‌जी ने भरतजीको सारा मंगल समाचार सुनाया । तुलसी- दासजी कहते हैं, उस [मंगल-समाचाररूप] अभीष्ट संजीवनी बूटीने उनकी अत्यन्त घोर वियोग-व्यथाको नष्ट कर दिया ॥ ५ ॥ अयोध्यामें आनंद राग धनाश्री [ २१ ] सुनियत सागर सेतु बँधायो । कौसलपतिकी कुसल सकल सुधि कोउ इक दूत भरत पहँ ल्यायो ।१। बध्यो बिराध, त्रिसिर, खर-दूषन सूर्पनखाको रूप नसायो । हति कबंध, बल-अंध बालि दलि, कृपासिंधु सुग्रीव बसायो ॥ २ ॥ सरनागत अपनाइ विभीषन, रावन सकुल समूल बहायो । बिबुध-समाज निवाजि, बाँह दै, बंदिछोर बर बिरद कहायो ॥ ३ ॥ एक-एकसों समाचार सुनि नगर लोग जहँ तहँ सब धायो । घन धुनि अकनि मुदित मयूर-ज्यों, बूड़त जलधि पार-सो पायो ॥४॥

गीतावली ३७६ 'अवधि आजु' यौँ कहत परसपर, बेगिबिमान निकट पुर आयो । उतरि अनुज-अनुगनि समेत प्रभु गुर-द्विजगन सिर नायो ॥ ५ ॥ जौ जेहि जोग राम तेहि बिधि मिलि, सबके मन अति मोद बढ़ायो । भेंटी मातु, भरत भरतानुज, क्यौं कहौं प्रेम अमित अनमायो । ६ । तेहि दिन मुनिबृन्द अनंदित तुरत तिलकको साज सजायो । महाराज रघुबंस नाथको सादर तुलसिदास गुन गायो ॥ ७ ॥ [भगवान्‌की वनमें की हुई लीलाओंको सुनकर नगरके लोग आपसमें कहने लगे—] क्यों जी, सुना जाता है रामचन्द्रजीने समुद्रका पुल बँधवाया था ? कोई एक दूत कोसलपति भगवान्‌ रामका सारा कुशल-समाचार भरतजीके पास लाया था ॥ १ ॥ कहते हैं, कृपासागर रामने विराध, खर, दूषण, और त्रिशिराका वध किया, शूर्पणखाको कुरूपा बना दिया तथा कबन्धको मारकर, बलसे अंधे हुए बालिका दमनकर सुग्रीवका घर बसा दिया ॥ २ ॥ फिर शरणमें आये हुए विभीषणको अपनाकर रावणको सकुटुम्ब समूल नष्ट कर दिया । इस प्रकार अपनी भुजाओंका आश्रय दे देवसमाज- की रक्षा कर अपना 'बंदिछोर' यह श्रेष्ठ सुयश प्रसिद्ध किया ॥ ३ ॥ इसी तरह एक-एकसे समाचार पा सब नागरिक जहाँ-तहाँ दौड़ने लगे, जैसे मेघकी ध्वनि सुनकर मयूर प्रसन्न हो जायें, अथवा समुद्रमें डूबते हुएको किनारा मिल जाय ॥ ४ ॥ 'वनवासकी अवधि आज ही है' इस प्रकार आपसमें कहते-कहते शीघ्र ही विमान नगरके निकट आ गया । उससे भाई लक्ष्मण और अपने अनुचरोंके सहित उतरकर प्रभुने गुरु तथा अन्य ब्राह्मणोंको सिर नवाया ॥ ५॥ जो जिस योग्य था उससे उसी प्रकार मिलकर रामचन्द्रजी ने सबके

३७७ लंकाकाण्ड हृदयमें खूब आनन्द बढ़ाया। फिर वे भरत, शत्रुघ्न माताओंसे मिले। उस समय जो अपरिमित प्रेम उमड़ा, उसका किस प्रकार वर्णन करूँ ॥ ६ ॥ मुनिमण्डलने उसी दिन तुरन्त अति आनन्दित हो राज्याभिषेककी तैयारी कर दी। तुलसीदासने भी आदरपूर्वक महाराज रघुनाथजीका गुणगान किया है ॥ ७ ॥ राज्याभिषेक राग जैतश्री [ २२ ] रन जीति राम राउ आए। सानुज सदल ससीय कुसल आजु, अवध आनंद-बधाए ॥ १ ॥ अरिपुर जारि, उजारि, मारि रिपु, बिबुध सुबास बसाए। धरनि-धेनु, महिदेव-साधु, सबके सब सोच नसाए ॥ २ ॥ दई लंक, थिर थपे बिभीषन, बचन-पियूष पिआए। सुधा सींचि कपि, कृपा नगर-नर-नारि निहारि जिआए ॥ ३ ॥ मिलिगुर, बंधु, मातु, जन, परिजन, भए सकल मन भाए। दरस-हरस दसचारि बरसके दुख पलमें बिसराए ॥ ४ ॥ बोलि सचिव सुचि, सोधि सुदिन, मुनि मंगल-साज सजाए। महाराज-अभिषेक बरषि सुर सुमन निसान बजाए ॥ ५ ॥ लै लै भेंट नृप-अहिप-लोकपति अति सनेह सिर नाए। पूजि, प्रीति पहिचानि राम आदरे अधिक, अपनाए ॥ ६ ॥ दान मान सनमानि जानि रुचि, जाचक जन पहिराए। गए सोक-सर सूखि, मोद-सरिता-समुद्र गहिराए ॥ ७ ॥ प्रभु-प्रताप रबि अहित-अमंगल-अघ-उलूक-तम ताए। किये बिसोक हित-कोक-कोकनद लोक सुजस सुभ छाए ॥ ८ ॥

गीतावली ३७८ रामराज कुलकाज सुमंगल, सबनि सबै सुख पाए। देहिं असीस भूमिसुर प्रमुदित, प्रजा प्रमोद बढ़ाए ॥ ९ ॥ आश्रम-धरम-बिभाग बेदपथ पावन लोग चलाए। धरम-निरत, सिय-राम-चरन-रत, मनहु राम-सिय-जाए ॥ १० ॥ कामधेनु महि, बिटप कामतरु, कोउ बिधि बाम न लाये। ते तब, अब तुलसी तेउ जिन्ह हित सहित राम-गुन गाये ॥ ११ ॥ महाराज राम युद्ध जीतकर भाई, सेना और सीताके सहित सकुशल आ गये हैं। इसलिये आज अयोध्यामें आनन्दोत्सव हो रहा हैं ॥ १ ॥ उन्होंने शत्रुके नगरको उजाड़ और जलाकर तथा शत्रु- को मारकर देवताओंके घरोंको बसाया है। पृथ्वी, गौ, ब्राह्मण और साधु, इन सबके सभी शोक नष्ट कर दिये हैं ॥ २ ॥ विभीषणको लंका देकर उन्हें स्थिरतापूर्वक राज्याभिषिक्त कर वचनरूप अमृत पिलाया है और (युद्धमें मरे हुए) वानरोंको अमृतसे सींचकर जीवित कर अब अयोध्याके नर-नारियोंको कृपादृष्टिसे निहारकर जीवन-दान दिया है ॥ ३ ॥ गुरु, भाई, माता, सेवक और कुटुम्बीलोग प्रभुसे मिले, इससे उन सबकी सभी मनःकामनाएँ पूर्ण हो गयीं और प्रभुके दर्शनके आनन्दमें वे चौदह वर्षके दुःखों- को एक पलभरमें भूल गये ॥ ॥ मुनिवर वसिष्ठजीने सुमन्त आदि पवित्रचित्त मन्त्रियोंको बुलाकर शुभ दिन शोधकर मंगल-सामग्रियाँ एकत्र करायीं। भगवान् रामके राज्याभिषेकके समय देवताओंने फूल बरसाकर दुन्दुभी आदि बाजे बजाये ॥ ५ ॥ तथा भूपति, अहिपति और लोकपतियोंने तरह-तरहकी भेंटे ले भगवान्‌का पूजनकर उन्हें अत्यन्त प्रेमसे सिर नवाये। भगवान् रामने उनका प्रेम पहचानकर

३७१ लंकाकाण्ड खूब आदर किया और उन्हें अच्छी तरह अपनाया ॥ ६ ॥ फिर याचकोंको, उनकी रुचि देख-देखकर दान और मानसे सन्तुष्ट किया तथा उन्हें वस्त्रादि पहनाये । इससे उनके शोकरूप सरोवर सूख गये तथा आनन्दरूप नदी और समुद्र गम्भीर हो गये ॥ ७ ॥ प्रभुके प्रतापरूप सूर्यके सामने अहित, अमङ्गल और पापरूप उल्लू तथा अन्धकार लीन हो गये, सुहृद्रूप कोक (चकवा-चकवी) एवं कोकनद (कमल) शोकहीन हो गये तथा सम्पूर्ण लोकोंमें उनका सुयश छा गया ॥ ८ ॥ रामचन्द्रजीके राज्यमें सारे लौकिक कार्य मङ्गलमय रहे, सबको सब प्रकारके सुख प्राप्त हुए तथा ब्राह्मण लोग प्रसन्नतापूर्वक आशीर्वाद देकर प्रजाका आनन्द बढ़ाते रहे ॥ ९ ॥ भगवान् श्रीरामने आश्रमधर्मका विभाग कर लोगोंको पवित्र वेदमार्गपर प्रवर्तित किया । सब लोग धर्मपरायण तथा राम और सीताके चरणोंमें प्रीति करनेवाले थे, मानो साक्षात् राम और सीतासे ही उत्पन्न हुए हों ॥ १० ॥ पृथिवी कामधेनुरूप तथा वृक्ष कल्पतरुके समान हो गये; विधाता किसीके प्रति विपरीत नहीं रहा । तुलसी- दासजी कहते हैं, यह तो उस समयके लोगोंकी बात है, किन्तु इस समय भी जिन्होंने प्रीतिपूर्वक रघुनाथजीके गुण गाये हैं, उन्हें वही आनन्द प्राप्त हुआ है ॥ ११ ॥ राग टोड़ी [ २३ ] आजु अवध आनंद-बधावन, रिपुरन जीति राम आए । सजि सुबिमान निसान बजावत मुदित देव देखन धाए ॥ १ ॥ घर घर चारु चौक चंदन-मनि, मंगल-कलस सबनि साजे । ध्वज-पताक, तोरन, बितानबर, बिबिध भांति बाजन बाजे ॥ २ ॥

गीतावली ३८० राम-तिलक सुनि दीप दीपके नृप आए उपहार लिये। सोयसहित आसीन सिंहासन निरिख जोहारत हरष हिये ॥ ३ ॥ मंगलगान, बेदधुनि, जयधुनि, मुनि-आसीस-धुनि भुवन भरे। बरषि सुमन सुर-सिद्ध प्रसंसत, सबके सब संताप हरे ॥ ४ ॥ राम-राज भइ कामधेनु महि, सुख संपदा लोक छाए। जनम जनम जानकीनाथके गुनगन तुलसिदास गाये ॥ ५ ॥ महाराज राम शत्रुको युद्धमें जीतकर आये हैं; इसलिये आज अयोध्यामें आनन्दमय बधावा हो रहा है। देवतालोग अपने सुन्दर विमान सजाकर प्रसन्नतापूर्वक बाजे बजाते उन्हें देखनेके लिये दौड़े आ रहे हैं ॥ १ ॥ घर-घरमें चन्दन और मणियोंके सुन्दर चौक पूरे गये हैं, सबने मङ्गलकलश तथा ध्वजा, पताका, तोरण और अच्छे- अच्छे चँदोवे सजाये हैं तथा जगह-जगह तरह-तरहके बाजे बज रहे हैं ॥ २ ॥ रामचन्द्रजीके राज्याभिषेकका समाचार सुनकर द्वीप- द्विपान्तरोंके राजालोग उपहार लिये आये हैं, और भगवान् रामको सीताजीके सहित सिंहासनपर बैठे देख हृदयमें हर्षित होकर जुहारते हैं ॥ ३ ॥ सारे भुवन मङ्गलगान, वेदध्वनि, जयघोष और मुनीश्वरोंके आशीर्वादात्मक शब्दोंसे भरे हुए हैं। देवता और सिद्धलोग पुष्प बरसाकर भगवान्की प्रशंसा करते हैं तथा भगवान्ने भी सबके सभी दुःख दूर कर दिये हैं ॥ ४ ॥ भगवान् रामके राज्यमें पृथ्वी कामधेनुरूपा हो गयी है और सम्पूर्ण लोक सुख एवं सम्पत्तिसे छा गये हैं। तुलसीदासने भी जन्म-जन्ममें श्रीसीतापतिके ही गुणगणका गान किया है ॥ ५ ॥

ॐ श्रीसीतारामभ्यां नमः गीतावली —★★— उत्तरकाण्ड रामराज्य राग सोरठ [ १ ] बनतें आइकै राजा राम भए भुआल । मुदित चौदह भुअन, सब सुख सुखी सब सब काल ॥ १ ॥ मिटे कलुष-कलेस-कु लषन, कपट-कुपथ-कुचाल । गए दारिद, दोष दारुन, दंभ-दुरित-दुकाल ॥ २ ॥ कामधुक महि, कामतरु तरु, उपल मनिगन लाल । नारि-नर तेहि समय सुकृति, भरे भाग सुभाल ॥ ३ ॥ बरन-आश्रम-धरमरत, मन बचन बेष मराल । राम-सिय-सेवक-सनेही, साधु, सुमुख, रसाल ॥ ४ ॥ राम-राज-समाज बरनत सिद्ध-सुर-दिगपाल । सुमिरि सो तुलसी अजहुँ हिय हरष होत बिसाल ॥ ५ ॥ बनसे आकर महाराज राम भूपति हुए। उनके राज्यमें चौदहों भुवन आनन्दित हो गये और सब लोग सब समय सब प्रकारके सुखोंसे सुखी रहने लगे ॥ १ ॥ सब प्रकारके पाप, क्लेश, कुलक्षण, कपट, कुमार्ग और कुचाल नष्ट हो गये तथा दरिद्रता, दारुण दोष, दम्भ, दुरित और दुष्काल आदिका नाम मिट गया ॥ २॥

गीतावली ३८२ पृथ्वी कामधेनुरूपा हो गयी, वृक्ष साक्षात् कल्पतरु हो गये और पत्थर मणि तथा लाल आदि हो गये । इस प्रकार उस समय सभी स्त्री, पुरुष पुण्यवान् एवं भाग्यशाली थे ॥ ३ ॥ वे अपने-अपने वर्णाश्रमधर्मोंमें तत्पर, मन, वचन और वेषसे हंसके समान स्वच्छ- पवित्र, राम और सीताके सेवक, प्रेमी, साधुचरित, प्रसन्नवदन एवं विनम्र थे ॥ ४ ॥ भगवान् रामके राजसमाजका तो सिद्ध, देवता और दिग्पालगण भी बखान किया करते थे । तुलसीदासजी कहते हैं, उसकी बातोंको याद करके हृदयमें आज भी अत्यन्त आनन्द होता है ॥ ५ ॥ रामरूप-वर्णन राग ललित [ २ ] भोर जानकी जीवन जागे । सूत-मागध प्रबीन, बेनु-बीना-धुनि द्वारे, गायक सरस राग रागे । १ । स्यामल सलोने गात, आलसबस जँभात प्रिया प्रेमरस पागे । उनींदे लोचन चारु, मुख-सुखमा-सिंगार हेरि हारे मार मूरि भागे २ सहज सुहाई छबि, उपमा न लहैं कबि, मुदित, बिलोकन लागे । तुलसिदास निसिबासर अनूप रूप रहत प्रेम-अनुरागे ॥ ३ ॥ प्रातःकाल होते ही जानकी जीवन भगवान् राम जागे । उस समय सुचतुर सूत और मागधोंने विरदावली कहना आरम्भ कर दिया, द्वारपर बाँसुरी और वीणाकी ध्वनि होने लगी तथा गायकोंने सरस राग अलापना आरम्भ कर दिया ॥ १ ॥ भगवान्‌का अति सुन्दर श्याम शरीर प्रियाके प्रेमरसमें पगकर आलस्यके कारण

३८३ उत्तरकाण्ड अँगड़ाने लगा। उनके कुछ उनीदे-से मनोहर नेत्र तथा मुखकी प्रतिभा और शृङ्गार देखकर अनेकों कामदेव भी हार मानकर भाग गये ॥ २ ॥ उनकी छवि स्वभावसे ही शोभामयी है, उसकी उपमा कोई भी कवि नहीं पा सकता; अतः वे प्रसन्नतापूर्वक उसकी ओर देखते रहते हैं। तुलसीदास कहते हैं, इस प्रकार वे अहर्निश प्रभु- के अनूप रूपके प्रेममें मग्न रहते हैं ॥ ३ ॥ राग कल्याण [ ३ ] रघुपति राजीवनयन सोभातन, कोटि मयन, करुनारस-अयन अयन-रूप भूप, माई। देखो सखि-अतुलित छवि, संत-कंज-कानन रवि, गावत कल कीरति कबि-कोबिद-समुदाई ॥ १ ॥ मज्जन करि सरजुतीर ठाढ़े रघुबंसबीर, । सेवत पदकमल धीर निरमल चित लाई। ब्रह्ममंडली-मुनींद्रबृंद-मध्य इंदुबदन राजत सुखसदन लोकलोचन-सुखदाई ॥ २ ॥ बिथुरित सिररुह बरूथ कुंचित, बिच सुमन-जूथि, मनिजुत सिसु-फनि-अनेक ससि समीप आई। जनु सभीति दै अँकोर राखे जुग रुचिर मोर, कुंडल-छवि निरखि चोर सकुच अधिकाई ॥ ३ ॥ ललित भ्रुकुटि, तिलक भाल, चिबुक-अधर-द्विज रसाल, हास चारुतर, कपोल, नासिका सुहाई। मधुकर जुग पंकज बिच, सुक बिलोकि नीरजपर लरत मधुप-अवलि मानो बीच कियो जाई ॥ ४ ॥

गीतावली ३८४ सुंदर पटपीत बिसद, भ्राजत बनमाल उरसि, तुलसिका-प्रसून-रचित, बिबिध-बिधि बनाई। तरु-तमाल अधबिच जनु त्रिबिधि कोरपाँति-रुचिर, हेमजाल अंतर परि तातें न उड़ाई॥ ५ ॥ संकर-ह्रद-पुंडरीक निसि बस. हरि-चंकरीक, निर्व्यलोक-मानस-गृह संतत रहे छाई। अतिसय आनंदमूल तुलसिदास सानुकूल, हरन सकल सूल, अवध-मंडन रघुराई॥ ६ ॥ अरी माई ! कमलनयन महाराज रघुनाथजी करोड़ों कामदेवों- के समान सुन्दर शरीरवाले, करुणा-रसके आगार और आनन्दस्वरूप हैं। सखि ! देखो, उनकी अतुलित छवि साधु-समाजरूप कमलवन- के लिये सूर्यस्वरूप है और उनकी पवित्र कीर्ति कवि तथा विद्वत्समुदाय गान करते हैं॥ १॥ अहा ! रघुवंशवीर श्रीरामचन्द्रजी स्नान करनेके अनन्तर सरयूतटपर खड़े हैं। उनके चरणकमलोंको मनस्वी भक्तगण अपना निर्मल चित्त लगाकर सेवन कर रहे हैं। इस प्रकार सम्पूर्ण लोकोंके नेत्रोंको आनन्दित करनेवाले आनन्दधाम चन्द्रवदन भगवान् राम ब्राह्मणसमाज तथा मुनीन्द्रमण्डलीके मध्यमें विराजमान हैं॥ २॥ उनकी कुञ्चित अलकावली बिथुरी हुई है, जिनके बीच-बीचमें फूलोंके गुच्छे लगे हैं। वे ऐसे मालूम होते हैं मानो मणियोंके सहित बालसर्पोंका समुदाय चन्द्रमाके समीप आया हो और उसे देखकर चन्द्रमाने भयभीत होकर उससे बचनेके लिये दो मनोहर मोरोंको फुसलाकर रख छोड़ा हो और उन (मोररूप) कुण्डलोंकी छवि देखकर वे (सर्परूप) चोर अत्यन्त सकुचाते हों।

३८५ उत्तरकाण्ड [यहाँ भगवान्‌का मुख चन्द्रमा है, केशकलाप सर्पबालक हैं, उनमें गूँथे हुए फूल उनकी मणियाँ हैं और कानोंके कुण्डल दो मोर हैं] ॥ ३ ॥ उनकी भ्रूकुटि अत्यन्त सुन्दर है, माथेपर तिलक शोभायमान है तथा चिबुक, अधर और दन्तावली बड़ी ही सरस हैं। उनकी हँसी बड़ी ही मनमोहिनी तथा कपोल और नासिका बड़े ही सुघड़ हैं। ऐसा जान पड़ता है मानो [नेत्ररूप] कमलों- पर [भ्रूकुटिरूप] दो भौंरे बैठे हैं; तथा [मुखरूप] पङ्कजपर [अलकावलीरूप] भ्रमरोंको लड़ते देख [नासिकारूप] शुकने उनका बीच-बचाव किया हो ॥ ४ ॥ भगवान्‌के शरीरपर अति सुन्दर और विशद पीताम्बर तथा हृदयमें तुलसी एवं विविध प्रकारके पुष्पोंसे अनेक प्रकारसे बनायी हुई वनमाला शोभायमान है। जो ऐसी मालूम होती है मानो [श्यामशरीररूप] तमालवृक्षके बीचमें [वनमाला-रूप] तिरंगे शुकपक्षियोंकी मनोहर पंक्ति हो और वह [पीताम्बररूप] सुवर्णपाशके भीतर पड़ जानेसे उड़ न सकती हो ॥ ५ ॥ जो रामरूप भ्रमर श्रीशंकरके हृदयकमलमें अहर्निश निवास करते हैं और जो छलहीन पुरुषोंके मनमन्दिरमें निरन्तर बसे रहते हैं, वे सकल तापापहारी अवधविभूषण परमानन्दमूल श्रीरघुनाथजी तुलसीदासपर सर्वदा प्रसन्न रहें ॥ ६ ॥ [ ४ ] राजत रघुबीर धीर, भंजन भव-भीर, पीर- हरन सकल सरजूतीर निरखहु, सखि ! सोहैं। संग अनुज मनुज-निकर, दनुज-बल-बिभंग-करन अंग अंग छबि अनंग अगनित मन मोहैं ॥ १ ॥ गी० २५—

गीतावली ३८६ सुखमा-सुख-सील-अयन नयन निरखि निरखि नील कुंचित कच, कुंडल कल, नासिका चित पोहैं। मनहु इंदुबिंब मध्य कंज-मीन-खंजन लखि मधुप-मकर-कीर आए तकि तकि निज गौहैं॥ २ ॥ ललित गंड-मंडल, सुबिसाल भाल तिलक झलक मंजुतर मयंक-अंक, रुचिर बंक भौंहैं। अरुन अधर मधुर बोल, दसन-दमक दामिनि दुति, हुलसति हिय हँसनि चारु, चितवन तिरछैहैं। ३ ॥ कंबुकंठ, भुज बिसाल उरसि तरुन तुलसिमाल, मंजुल, मुकतावलि जुत जागति जिय जोहैं। जनु कलिंद-नंदनि मनि-इन्द्रनील-सिखर परसि धँसति लसति हंससेनि-संकुल अधिकौहैं॥ ४ ॥ दिब्यतर दुकूल भव्य नब्य रुचिर चंपक चय, चंचला-कलाप, कनक-निकर अलि ! किधौं हैं। सज्जन-चष-झष-निकेत, भूषन-मनिगन समेत, रूप-जलधि-बपुष लेत मन-गयंद बोहैं॥ ५ ॥ थकनि बचन-चातुरी, तुरीय पेखि प्रेम-मगन पग न परत इत उत, सब चकित तेहि समो हैं। तुलसिदास यह बुधि नहि कौनकी, कहाँतें आई, कौन काज, काके ढिग कौन ठाउ को हैं॥ ६ ॥ 'अरी सखि ! देख, संसारके दुःखको दूर करने सर्वतापा- पहारी धीर-वीर रघुनाथजी सरयूतटपर शोभायमान हैं। उनके साथ छोटे भाई और बहुत-से लोग-बाग हैं, वे स्वयं भी शत्रुओंकी सेनाको छिन्न-भिन्न करनेवाले हैं तथा उनके अङ्ग-अङ्गकी शोभा अगणित