गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगीतावली ३७० तुलसी सुनि सौमित्रि-बचन सब धरि न सकत धीरौ धीरै । उपमा राम-लषनकी प्रीतिकी क्यों दीजै खीरै-नीरै ॥ ३ ॥ संजीवनी बूटी खाकर सचेत होनेपर [जब पीड़ा आदिके विषयमें पूछा गया तो ] लक्ष्मणजी ने प्रेमसे पुलकित हो शरीरानु- सन्धानको भूलकर कहा—'मेरे हृदयमें तो केवल घाव ही है, उसकी पीड़ा तो रघुनाथजीको है ॥ १ ॥ जैसे तोतेसे कोई उसके पाठके अर्थकी चर्चा करे, वैसे ही आप लोग बार-बार मुझसे क्या पूछते हैं; हीरेके द्वारा शोभा, सुख तथा हानि या लाभ—ये सब तो राजाको ही होते हैं, हीरेकी तो केवल कान्ति तथा कीमत ही होती है ॥ २ ॥ तुलसीदासजी कहते हैं, लक्ष्मणजी के ये वचन सुनकर बड़े-बड़े धीर भी धैर्य धारण नहीं कर सकते । उन राम और लक्ष्मणके प्रेमकी उपमा दूध और पानीसे भी कैसे दी जाय ? ॥ ३ ॥ विजयी राम राग कान्हरा [ १६ ] राजत राम काम सत-