भारतकोश
गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

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पृष्ठ 377

३७१ लंकाकाण्ड अपने शत्रु रावणको युद्धस्थलमें जीतकर भगवान् राम भाईके साथ विराजमान हैं। इस समय वे सैकड़ों कामदेवोंसे भी सुन्दर जान पड़ते हैं और अपना करकमल धनुष और बाणपर फेर रहे हैं ॥ १॥ उनके श्याम शरीरपर पसीनेकी सुन्दर बूंदें और बीच-बीचमें मनोहर रुधिरकण शोभायमान हैं, मानो किसी मरकतमणिके पर्वत- शिखरपर जुगुनुओंके समूहमें बीरबहूटियाँ शोभा पा रही हों ॥ २ ॥ उनके चारों ओर घायल वीर बैठे हुए हैं। वे सम्पूर्ण रीछ-वानर बड़े ही प्रसन्न हैं। उस समय प्रभु ऐसे जान पड़ते हैं, मानों फूले हुए किंशुक वृक्षोंके बीचमें एक अति विशाल और तरुण तमालवृक्ष हो ॥ ३॥ उस समय कमलनयन भगवान् रामने कृपादृष्टिसे देखकर सब मुनि, नाग, देवता और मनुष्योंको निर्भय कर दिया। तुलसीदासजी कहते हैं, यह दुःसह विपत्तिको दूर करनेवाला अनुपम रूप हमारे हृदयकमलमें विराजमान रहे ॥ ४ ॥ अयोध्यामें प्रतीक्षा राग आसावरी [ १७ ] अवधि आजु किधौं औरो दिन द्वै हैं। चढ़ि धौरहर, बिलोकि दखिन दिसि, बूझ धौं पथिक कहाँते आये वै हैं ॥ १ ॥ बहुरि बिचारि हारि हिय सोचति, पुलकि गात लागे लोचन च्वैहैं। निज बासरनि बरष पुरवंगोबिघ, मेरे वहां कठिन कृत क्वैहैं बन रघुबीर, मातु गृह जीवति, निलज प्रान सुनि सुनि स्वैहैं। तुलसीदास मो-सी कठोर-चित कुलिस सालभंजनि की द्वै हैं ॥ २ ॥