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गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

पृष्ठ 374, कुल 454 में से

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पृष्ठ 374

गीतावली ३६८ जब सुमित्राने सुना कि लक्ष्मणजी युद्धस्थलमें घायल पड़े हैं और उन्होंने अपने स्वामीके लिये विपक्षी योद्धा मेघनादसे रणभूमिमें खूब ललकारकर लोहा भिड़ाया है ॥ १ ॥ तो उन्हें पुत्रकी दशासे तो शोक हुआ और इस बातसे संतोष हुआ कि उन्होंने रघुनाथजी- की भक्तिको स्वीकार किया । उनके अङ्ग एक क्षणमें शोकमें सूख जाते हैं और फिर दूसरे ही क्षणमें आनन्दसे हरे हो जाते हैं ॥ २ ॥ तब माता सुमित्राने नेत्रोंमें जल भरकर, स्वभावसे ही हनूमान्‌जीसे कहा—'रामजी कुअवसरमें भाईसे बिछुड़ गये, यद्यपि धनुष उनके साथ है [जिसके होते हुए उन्हें अन्य किसीकी सहायताकी अपेक्षा नहीं है]' ॥ ३ ॥ [हनूमान्‌जीसे ऐसा कहकर वे शत्रुघ्नजीसे बोली—] 'भैया ! तुम इस हनूमान्‌के साथ जाओ ।' यह सुनते ही शत्रुघ्नजी हाथ जोड़कर खड़े हो गये और शरीरमें पुलकायमान होकर ऐसे प्रसन्न हुए मानो दैवयोगसे उनके पूरे-पूरे दाँव पड़ गये हों ॥ ४ ॥ माता और छोटे भाईकी यह दशा देखकर हनूमान् और भरतजी बड़े ही ग्लानिग्रस्त हो गये । तुलसीदासजी कहते हैं तब माताने उन सबको समझाकर सचेत किया ॥ ५ ॥ [ १४ ] बिनय सुनयनी परि पाय । कहाँ कहा, कपीस ! तुम्ह सुचि, सुमति, सुहृद सुभाय ॥ १ ॥ स्वामि-संकट-हेतु हौं जड़ जननि जनम्यो जाय । समौ पाइ, कहाइ सेवक घट्यो तौ न सहाय ॥ २ ॥ कहत सिथिल सनेह भो, जनु घोर घायल घाय । भरत-गति लखि मातु सब रहि ज्यौं गुड़ी बिनु बाय ॥ ३ ॥

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