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गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

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पृष्ठ 327

३२१ सुन्दरकाण्ड [ २४ ] आपनी आपनी भाँति सब काहू की है। मंदोदरी, महोदर, मालवान महामति, राजनीति पहुँच जहाँलौं जाकी रही है ॥ १ ॥ महामद-अंध दसकंध न करत कान, मीचु-बस नीच हठि कुगहनि गही है। हँसि कहै, सचिव सयाने मोसों यों कहत, चहै मेरु उड़न, बड़ी बयारि बही है ॥ २ ॥ भालु, नर, बानर अहार निसिचरनिको, सोऊ नृप-बालकनि मांगी छारि लही है। देखो कालकौतुक, पिपीलिकनि पंख लागो, भाग मेरे लोगनिके भई चित-चही है ॥ ३ ॥ 'तोसो न तिलोक आजु साहस, समाज-साजु, महाराज-आयसु भो जोई, सोई सही है'। तुलसी प्रनामकै बिभीषन बिनती करै 'खग्राल बेधे ताल, कपि केलि लंका दही है' ॥ ४ ॥ इसी प्रकार मन्दोदरी, महोदर और महापति माल्यवान् आदि सभीने जिसकी जहाँतक राजनीतिमें पहुँच थी, अपनी-अपनी विधिसे रावणसे बहुत कुछ कहा ॥ १ ॥ किन्तु महान् मदसे अंधा रहनेके कारण उसने कुछ भी नहीं सुना। उस नीचने मृत्युके वशीभूत होकर आग्रहपूर्वक कुमार्गको ही ग्रहण किया। वह हँसकर कहने लगा—'अहा ! हमारे चतुरमन्त्री मानो ऐसी बात कहते हैं कि भाई ! बड़ी तेज हवा चल रही हैं, इसलिये सुमेरु पर्वत उड़ना चाहता है ! ॥ २ ॥ अरे ! रीछ, वानर और मनुष्य तो स्वभावसे ही गी० २१—

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