गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगीतावली ३२२ राक्षसोंके आहार हैं; तिसपर भी इन राजकुमारोंको यह माँगी हुई सेना प्राप्त हुई है। कालका खेल तो देखो, आज चींटियोंके पर लगने लगे; मेरे भाग्यसे ही लोगोंकी चितचाही हुई है [इसीसे उन्हें अनायास भरपेट आहार मिला है] ॥ ३ ॥ तुलसीदासजी कहते हैं, तब विभीषणने प्रणाम कर कहा—'महाराज ! आपकी जैसी आज्ञा है वही होगा, सचमुच आज त्रिलोकीमें साहस और सैन्य- बलमें आपके समान कोई नहीं है; [परंतु उधरका भी बल देख लीजिये।] भगवान् रामने [बालिवधके समय] संकल्पमात्रसे ही सात तालवृक्षोंको वेध दिया था और वानर हनुमान्ने खेलहीमें लङ्काको भस्म कर दिया था !' ॥ ४ ॥ [ २५ ] दूसरो न देखतु साहिब सम रामै । बेदऊ पुरान, कबि-कोबिद बिरंच-रत, जाको जस सुनत गावत गुन-ग्रामै ॥ १ ॥ माया-जीव, जग-जाल, सुभाउ, करम-काल, सबको सासकु, सब मैं, सब जामैँ । बिधि-से करनिहार, हरिसे, पालनिहार हर-से हरनिहार जपै जाके नामैँ ॥ २ ॥ सोइ नरबेष जानि, जनकी बिनती मानि, मतौ नाथ सोई, जातें भलो परिनामैं । सुभट-सिरोमनि कुठारपानि सारिखेहू लखी श्रौ लखाई, इहाँ किए सुभ सामैं ॥ ३ ॥ बचन-बिभूषन बिभीषन-बचन सुनि लागे दुख दूषन-से दाहिनेउ बामैं ।