भारतकोश
गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

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पृष्ठ 329

३२३ सुन्दरकाण्ड तुपसो हुमकि हिये हन्यो लात, 'भले तात,' चल्यो सुरतरु ताकि तजि घोर घामैं ॥ ४ ॥ [विभीषण रावणसे कह रहा है—] 'रामके समान कोई और स्वामी दिखलायी नहीं देता, जिनके बिरदके बखानमें वेद, पुराण, कवि और विद्वज्जन रत रहते हैं तथा जिनके सुयशका श्रवण और गुणसमूहका गान करते रहते हैं ॥१॥ जो माया जीव, जगज्जाल, स्वभाव कर्म और काल—सबका शासक है, जो सबमें व्याप्त है और जिसमें सब स्थित हैं तथा जिनके नामको ब्रह्मा-जैसे रचयिता, विष्णु- जैसे पालक और शंकर-जैसे संहारक जपते रहते हैं ॥ २ ॥ वे ही राम नर-वेषमें अवतरित हुए हैं ऐसा जानो और मुझ दासकी विनय मान- कर ऐसी सलाह करो जिससे अन्तमें भला हो । देखो, कुठारधारी परशु जैसे शूरशिरोमणिने भी देख-दिखाकर समझ लिया कि यहाँ [अर्थात् रामसे] सन्धि कर लेनेमें ही कल्याण है' ॥ ३ ॥ विभीषण- के ये वाणीको विभूषित करनेवाले वचन सुनकर रावणको अनुकूल होनेपर भी अत्यन्त प्रतिकूल तथा दुःखमय और दूषित जान पड़े । अतः उसने हुमकर उनकी छातीमें लात मारी, तब विभीषण 'भैया ! अच्छा ! !' ऐसा कह [रावणरूप] घोर घामको त्यागकर [रामरूप] कल्पवृक्षकी ओर चल पड़े ॥ ४ ॥ विभीषण-शरणागति [ २६ ] जाय माय पायँ परि कथा सो सुनाई है । समाधान करति बिभीषनको बार बार, 'कहा भयो तात ! लात मारे, बड़ो भाई ॥ १ ॥