गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
पृष्ठ 330, कुल 454 में से
संदर्भ में पढ़ेंगीतावली ३२४ साहिब, पितु समान, जातुधानको तिलक, ताके अपमान तेरी बड़िए बड़ाई है। गरत गलानि जानि, सनमानि सिख देति, 'रोष किये दोष, सहें समुझें भलाई है ॥ २ ॥ इहांतें बिमुख भये, रामको सरन गए भलो नेकु, लोक राखे निपट निकाई हैं'। मातु-पंग सीस नाइ, तुलसी असीस पाइ चले भले सगुन, कहत 'मन भाई' है ॥ ३ ॥ विभीषणने अपनी माताके पास जाकर उसके चरणोंमें गिर वह सब वृत्तान्त सुना दिया। माता बारम्बार उन्हें समझाने लगी— 'भैया ! उसके लात मारनेसे क्या हुआ, आखिर तो वह तेरा बड़ा भाई ही है ॥ १ ॥ वह प्रथम तो तेरा स्वामी, दूसरे पिताके समान ज्येष्ठ भ्राता और तिसपर भी राक्षसकुलका तिलक है। उसके तो अपमान करनेमें भी तेरा बड़ा सम्मान ही है।' विभीषणको अत्यन्त खिन्न देख वह इसी प्रकार बहुत सत्कारपूर्वक समझाने लगी और बोली—'भैया ! इस समय क्रोध करनेमें तो बड़ा भारी दोष है और सहने-समझ लेनेमें सब प्रकार भलाई है ॥ २ ॥ हाँ, यहाँसे विमुख होकर रामकी शरण चले जानेमें थोड़ी-सी भलाई अवश्य है, फिर भी यदि लोककी रक्षा कर सको तो पूरी भलाई है।' [अर्थात् भाई का पक्ष छोड़नेकी अपेक्षा उसका पक्ष ग्रहण करके व्यवहारकी रक्षा करना ही उत्तम है।] तुलसीदासजी कहते हैं, तब विभीषण माताके चरणोंमें सिर नवा उसका आशीर्वाद पा वहाँसे चल पड़े। मार्गमें अच्छे-अच्छे शकुन होते देखकर कहने लगे—'मेरा तो मन- चाहा हो गया' ॥ ३ ॥