गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३२५ सुन्दरकाण्ड 【 २७ 】 'भाई को सो करौं, डरौं कठिन कुफेरें । सुकृत-संकट परचो, जात गलानिन्ह गरचो, कृपानिधिको मिलौं पै मिलिकै कुबेरें' ॥ १ ॥ जाइ गह पांय, धाइ धनद उठाइ भेट्यो, समाचार पाइ पोच सोचत सुमेरें । तहँई मिले महेस, दियो हित उपदेस, रामकी सरन जाहि 'सुदिनु न हेरें ॥ २ ॥ जाको नाम कुंभज कलेस-सिंधु सोखिबेको, मेरो कह्यो मानि, तात ! बांधे जिनि बेरें । तुलसी मुदित चले, पाये हैं सगुन भले, रंक लूटिबेको मानो मनिगन-ढेरें ॥ ३ ॥ विभीषणजी इस प्रकार चिन्ता करने लगे—'मुझे भाईका-सा व्यवहार करना चाहिये, परन्तु बड़े भारी कुफेर (अड़चन) से मैं डर रहा हूँ।' इस प्रकार विभीषण धर्म-संकटमें पड़कर ग्लानिसे गले जा रहे थे। फिर उन्होंने निश्चय किया कि—'अच्छा, पहले भाई कुबेरसे मिलकर फिर कृपानिधान भगवान् रामसे मिलूंगा'॥१॥ ऐसा सोचकर उन्होंने कुबेरके पास जा उनके चरण पकड़ लिये । कुबेरजीने दौड़कर उन्हें उठाकर गले लगाया। फिर विभीषणसे कुसमाचार सुन, वे सुमेरुपर्वतपर खड़े-खड़े सोच-विचार करने लगे । उसी स्थानपर उन्हें श्रीमहादेवजी मिले; उन्होंने यह हितकर उपदेश दिया—'विभीषण ! तुम भगवान् रामकी शरण जाओ, इसमें कोई शुभ दिन देखनेकी आवश्यकता नहीं है ॥ २ ॥ हे तात ! जिनका नाम क्लेशरूप समुद्रको सोखनेके लिये अगस्त्यके समान है, उनके