गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगीतावली ३१८ जातुधानपति जानि कालबस मिले बिभीषन आइ। सरनागत-पालक कृपालु कियो तिलक, लियो अपनाइ॥ १०॥ कौतुकही बारिधि बँधाइ उतरे सुबेल-तट जाइ। तुलसिदास गढ़ देखि फिरे कपि, प्रभु-आगमन सुनाइ॥ ११॥ जिस समय रघुनाथजीने प्रयाण किया उस समय समुद्र क्षुभित हो गया और पर्वत डगमगाने लगे। इसी समय भगवान्ने अपना धनुष चढ़ाकर हाथमें उठाया॥ १॥ उसकी अति कठोर और भयंकर टंकार सुनकर ब्रह्मा और महादेव आदि चौंक पड़े। गङ्गाजी भगवान् शंकरके जटाजूटसे खिसकने लगीं, वे उन्हें सँभाल न सके। ॥ २॥ सारे दिक्पाल व्याकुल हो गये, चौदहों भुवन भयसे भर गये। लंकामें खलबली पड़ गयी, रावणके कान खड़े हो गये तथा शत्रुओंकी स्त्रियोंके गर्भ गिरने लगे॥४॥ रीछ और वानर बीर विकट सिंहनाद करते हुए दाँत पीसने लगे और शर्त लगाकर रघुनाथजीकी शपथ खाकर वे चढ़ा,ऊपरी करते हुए कूदने लगे ॥ ४॥ वे पर्वत तथा वृक्षोंको उठाये हुए थे; उनके तीखे नख तथा मुखमें पैने दाँत देखकर साक्षात् काल भी भय मानता था। वे दसों दिशाओंमें क्रोधसे भरकर 'पकड़ लो, पकड़ लो, यह बेचारा राक्षस है ही क्या चीज!' इस प्रकार कहते हुए चल रहे थे॥ ५॥ [इस वानर-सेनाके चलते समय इतनी धूल उड़ी कि] पवन पंगु हो गया, अग्नि, सूर्य और चन्द्रमा छिप गये तथा विमान थकित हो गये; देवता लोग पलक मारनेके लिये प्रार्थना करने लगे* और इन्द्र *क्योंकि देवताओंके पलक बंद नहीं होत और इस समय धूलिके कारण उन्हें बहुत दुःख हो रहा था। इन्द्रके सहस्र नेत्रोंमें धूलि भरकर पूरा बोझा हो गया।