भारतकोश
गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

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गीतावली ३१६ दीजिये और उनका दुःख दूर कीजिये, क्योंकि आप तो दीनजनों- के दुःखका दमन करनेवाले हैं ॥ ४ ॥ [ २१ ] कपिके सुनि कल कोमल बैन। प्रेमपुलकि सब गात सिथिल भए, भरे सलिल सरसीरुह-नैन ॥१॥ सिय-बियोग-सागर नागर-मनु बूडन लाग्यो सहित चित-चैन। लही नाव पवनज-प्रसन्नता, बरबस तहाँ गह्यो गुन मैन ॥२॥ सकत न बूझि कुसल, बूझे बिन गिरा बिपुल ब्याकुल उर-ऐन। ज्यों कुलीन शुचि सुमति बियोगिनि सनमुख सहै बिरह-सर पैन ॥३॥ धरि धरि धीर बीर कोसलपति किए जतन, सके उत्तरु दै न। तुलसिदास प्रभु सखा-अनुजसों सैनहिं कह्यो चलहु सजि सैन ॥४॥ हनूमान्‌जीके ये मधुर और कोमल वचन सुनकर रघुनाथजीके सब अङ्ग प्रेमसे पुलकित और शिथिल हो गये तथा उनके नेत्र-कमलों- में जल भर आया ॥ १ ॥ सीताजीके वियोगरूप समुद्रमें रामजीका मनरूप चतुर तैराक चित्तके आनन्दसहित डूबने लगा। इसी समय हनूमान्‌जीसे [सीताजीकी] सुधि पाकर उन्हें प्रसन्नतारूप नौका मिल गयी; तहाँ कामदेव (प्रेम) ने जबरदस्ती उस नावकी रस्सी- को पकड़ लिया कि पार न जा सकें ॥ २ ॥ इसलिये [गला भर आनेके कारण] वे सीताजीकी कुशल भी नहीं पूछ सकते थे और बिना पूछे उनकी वाणी भी हृदयरूप गृहमें अत्यन्त व्याकुल हो रही थी, जिस प्रकार कोई कुलीन और पवित्र बुद्धिवाली वियोगिनी स्त्री सामनेसे [अर्थात् दृढ़तापूर्वक] विरहके तीखे तीर सहन करती है ॥ ३ ॥ वीरवर कोसलनाथने अनेक बार धैर्य धारणकर बोलनेका