गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३१५ सुन्दरकाण्ड अतः आपके बाह्य वियोगके सामने उनका ध्यानादिजनित आन्तरिक सुख हार मान जाता है ॥ ३ ॥ [ २० ] तुम्हरे बिरह भई गति जोन । चित दै सुनहु, राम करुनानिधि ! जानौं कछु, पै सकौं कहिं हौं न ॥१॥ लोचन नीर कृपिनके धन ज्यों रहत निरंतर लोचनन-कोन । ‘हा’ धुनि-खगी लाज-पिंजरी महँ राखि हिये बड़े बधिक हठि मौन ॥२॥ जेहि बाटिका बसति, तहँ खग-मृग तजि-तजि भजे पुरातन भौन । स्वास-समीर भेंट भइ भोरेहु, तेहि मग पगु न धरचो तिहुँ पौन ॥३॥ तुलसिदास प्रभु ! दसा सीयको मुख करि कहत होति अति गौन । दीजै दरस, दूरि कीजै दुख, हौ तुम्ह आरत-आरति दोन ॥४॥ 'हे करुणानिधान रघुनाथजी ! आपके विरहमें जानकीजीकी जो गति हुई है, उसे ध्यान देकर सुनिये । मैं उसे कुछ जानता तो हूँ, पर कह नहीं सकता ॥ १ ॥ उनके नेत्रोंका जल कृपणके धनके समान सर्वदा नेत्रोंके कोनोंमें ही रह जाता है । मौनरूप भारी बधिकने ‘हा’ ध्वनिरूप पक्षिणीको हठपूर्वक लज्जारूप पिंजड़ेमें बंदकर हृदयमें ही रक्खा है। [अतः वह उनके हृदयमें ही रहती है, बाहर नहीं निकलने पाती] ॥ २ ॥ जिस वाटिकामें वे रहती हैं, वहाँके पशु- पक्षी [उनकी विरहाग्निसे संतप्त होकर] अपने पुराने निवासस्थानों- को छोड़कर चले गये हैं और उनके श्वासवायुके साथ भूलसे भी भेंट हो जानेपर शीतल-मन्द-सुगन्ध पवन फिर उस ओर पैर नहीं रखता ॥ ३ ॥ प्रभो ! सीताजीकी दशाका इस मुखसे वर्णन करनेसे तो वह अत्यन्त गौण-सी जान पड़ती है अतः अब आप उन्हें दर्शन