गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३११ सुन्दरकाण्ड हनुमान-हाँक सुनि बरषि फूल । सुर बार बार बरनहिं लँगूर ॥८॥ भरि भुवन सकल कल्यान-धूम । पुर जारि बारिनिधि बोरि लूम ॥६॥ जानकी तोषि पोषेउ प्रताप । जय पवन-सुवन दलि दुअन-दाप ॥१०॥ नाचहिं-कूदहिं कपि करि बिनोद । पीवत मधु मधुबन मगन मोद ॥११॥ यों कहत लषन गहे पाँय आइ । मनि सहित मुदित भेंटयो उठाइ ॥१२॥ लगे सजन सेन, भयो हियो हुलास । जयजय जस गावत तुलसिदास ॥१३॥ [ इस समय लक्ष्मणजी किष्किन्धापुरीमें गये हुए थे, वहाँ हनूमान्जीके लौटनेका समाचार पाकर भगवान् रामके पास आकर कहने लगे— ] 'रघुनाथजी ! देखिये, हनूमान्जी आ गये हैं, इन्होंने रावणके नगरमें खूब फाग खेला है ॥ १ ॥ ये रामकार्यके लिये शुभ दिन निश्चित कर अपने साथियोंको समझाकर समुद्र लांघ गये थे ॥ २ ॥ वहाँ उन्होंने सीताजीकी चरणवन्दना कर उनसे आशीर्वाद पाया और अशोकवनके अमृतसदृश फलोंको खूब पेट भरकर खाया ॥ ३ ॥ फिर उस वाटिकाको उजाड़कर इन्होंने होली- की तैयारी की और आग्रहपूर्वक अपनी पूंछको तेल और वस्त्रसे बँधवाया ॥ ४ ॥ उस समय लोग ढोल बजाते इनके संग हो लिये । तब इन्होंने चारों ओर आग लगा दी ॥ ५ ॥ उस अग्निमें इन्होंने राक्षसरूप आखत (नवीन अन्न) हवन किये । उसकी लपटें उठती देख- कर देवताओंके विमान भी भड़भड़ाकर भाग गये ॥ ६ ॥ उस समय आकाशमें बड़ा कुतूहल और लंकामें घोर विलाप होने लगा । पापीके पाप अन्तमें उसको जलाते ही हैं ॥ ७ ॥ देवतालोग हनूमान्जीकी गर्जना सुनकर बारंबार फूल बरसाते थे और इनकी पूंछकी प्रशंसा करते थे ॥ ८ ॥ इस प्रकार सम्पूर्ण लोकोंमें मङ्गलकी धूम मचा,