गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगीतावली ३१० आया ॥ १॥ वे संदेश कहना चाहती थीं; परन्तु पतिके चित्तकी अवस्थाको विचारकर नहीं कहा, अपने दुःसह दुःखको हृदयमें ही छिपा रखा। उनकी वह दशा देखकर कपिपति हनूमान्जी व्याकुल हो गये, जैसे ग्रीष्म ऋतुमें सूर्यके तापसे तपी हुई भूमिपर चलनेवाला पथिक तिलमिला उठता है ॥ २ ॥ उन्हें अपनी अमरता मृत्युसे भी बुरी लगी। वहाँ छल या बल किसीका अवसर न देख कर उन्हें अपना प्रेम कठोर जान पड़ने लगा। तब जानकीजीने उन्हें मातृप्रेमसे समझाकर आशीर्वाद दिया कि 'तुम्हारे ही मनकी इच्छा पूर्ण होगी' ॥ ३ ॥ फिर हनूमान्जीने करुणा, कोप, लज्जा और भयसे भरे हुए ही वहाँसे प्रस्थान किया और चुपचाप सीताजी- के चरणकमलोंमें सिर नवाया। तुलसीदासकी रसना रूखी है, इसी- से वह उस स्नेहसर्वस्व समयका वर्णन कर सकी है [अन्यथा सरस- हृदय तो उसका वर्णन ही नहीं कर सकते] ॥ ४ ॥ हनूमान्जीका भगवान् रामके पास पहुंचना राग बसन्त [ १६ ] रघुपति ! देखो आयो हनूमंत । लंकेस-नगर खेल्यो बसंत ॥ १॥ श्रीराम-काजहित सुदिन साधि । साथी प्रबोधि लाँघ्यो पयोधि ॥ २॥ सिय पाँय पूजि, आसिष पाइ । फल अमिय सरिस खायो अघाई ॥ ३॥ कानन दलि, होरी रचि बनाइ । हठि तेल बसन बालधि बँधाइ ॥ ४॥ लिए ढोल चले संग लोग लागि । बरजोर दई चहुँ ओर आगि ॥ ५॥ आखत आहुति किये जातुधान । लखि लपट भभरि भागे बिमान ॥ ६॥ नभतल कौतुक, लंका बिलाप । परिनाम पचहिं पातकी पाप ॥ ७॥