गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगीतावली ३०८ कर्म और दिकपालादि सम्पूर्ण प्रपञ्च जिस प्रभुके करतलगत है उसके शत्रुसे उसीके देशमें यदि मेरा युद्ध छिड़ जाता तो मेरा जीवन और मरण दोनों ही सफल हो जाते ॥४॥ रावण ! मैने तुम्हारी सारी सभा देख ली है ! इसमें मुझसे अधिक बलवान् कोई नहीं है । यदि मुझे स्वामीकी आज्ञा होती तो मैं शत्रु की शक्तिका अनुमान करके इतनी ग्लानि सहन न करता' ॥ ५ ॥ सीताजीसे बिदाई [ १४ ] तौलौं, मातु ! आपु नीके रहिबो । जौलौं हौं ल्यावौं रघुबीरहि, दिन दस और दुसह दुख सहिबो ॥ १ ॥ सोखिकै, खेतकै, बाँधि सेतु करि उतरिवो उदधि, न बोहित चहिबो । प्रबल दनुज-दल दलि पल आधमें, जीवत दुरित दसानन गहिबो ॥ २ ॥ बैरिबृंद-बिधवा-बनितन्हिको देखिबो बारि-बिलोचन बहिबो । साज सेनसमेत स्वामिपद निरखि परम मुद मंगल लहिबो ॥ ३ ॥ लंक-दाह उर आनि मानिबो सांचु राम-सेवकको कहिबो । तुलसी प्रभुसुर सुजस गाइहैं, मिटि जैहै सबको सोचु, दव दहिबो ॥ ४ ॥ [हनुमान्जी विदा होते समय सीताजीसे कहते हैं-] 'हे मातः ! जबतक मैं रघुनाथजीको यहाँ लाऊँ तबतक तुम अच्छी तरह रहना । इस दुःसह दुःखको दस दिन और सहन करना ॥ १ ॥ हमें समुद्रको सोखकर, पाटकर अथवा पुल बाँधकर उतरना होगा;