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गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

पृष्ठ 313, कुल 454 में से

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पृष्ठ 313

३०७ सुन्दरकाण्ड समझो ॥ ४ ॥ अहो ! जिनकी कृपासे पूर्वपुरुषोंने जगत्में जन्म लेकर समुद्रोंको रचा, खोदा और शोषण भी किया, यदि उन प्रभुको तुमने न पहचाना तो तुम्हारे बीस नेत्र घरके झरोखोंके समान ही हैं ॥ ५ ॥ राग मारू [ १३ ] जो हौं प्रभु आयसु लै चलतो । तौ यहि रिस तोहि महित दसानन ! जातुधान-दल दलतो ॥ १ ॥ रावन सो रसराज सुभट-रस सहित लंक-खल खलतो । करि पुटपाक नाक-नायकहित घने घने घर घलतो ॥ २ ॥ बड़े समाज लाज-भाजन भयो, बड़ो काज बिनु छलतो । लंकनाथ ! रघुनाथ, बैरु-तरु आज फैलि फूलि फलतो ॥ ३ ॥ काल-करम, दिगपाल, सकल जग-जाल जासु करतल तो । ता रिपुसों पर भूमि रारि रन जीवन-मरन सुथल तो ॥ ४ ॥ देखो मैं दसकंठ ! सभा सब, मोंतें कोउ न सबल तो । तुलसी अरि उर आनि एक अब एतो गलानि न गलतो ॥ ५ ॥ 'रावण ! यदि मैं प्रभुकी आज्ञा लेकर आता तो इसी रिसमें तुम्हारे सहित सम्पूर्ण राक्षससेनाका संहार कर डालता ॥ १ ॥ मैं रावणरूप पारेको अन्य शूरवीररूप रसोंके सहित फूंककर लंकारूप खरलमें घोटता । इस प्रकार देवराज इन्द्रके लिये पुटपाकविधिसे औषध तैयार करनेके लिये बड़े-बड़े घरोंको नष्ट कर देता ॥ २ ॥ आज इस बड़े समाजमें मैं व्यर्थ ही लज्जाका पात्र हुआ; इस बड़े कार्यको मैं निःसन्देह कर सकता था । लंकेश्वर ! रघुनाथजीका बैररूप वृक्ष आज खूब फैल-फूलकर फलित होता ॥ ३ ॥ काल,

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