भारतकोश
गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

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गीतावली ३०६ तपबल, भुजबल, कैसनेह-बल सिव बिरंचि नीकी बिधि तोषे । सो फल राजसमाज-सुवन-जन आपु न नास आपने पोषे ॥२॥ तुला पिनाक, साहु नृप, त्रिभुवन भट बटोरि सबके बल जोषे । परसुराम-से सूर-सिरोमनि पलमें भए खेतके धोखे ॥३॥ कालिकी बात बालिकी सुधि करि समुझि हिताहित खोलि झरोखे। कह्यो कुमंत्रिनको न मानिये, बड़ी हानि, जिय जानि त्रिदोषे ॥४॥ जासु प्रसाद जनमि जग पुरषनि सागर सृजे, खने अरु सोखे । तुलसिदास सो स्वामि न सूझ्यो, नयन बीस मंदिर के-से मोखे ॥५॥ [अब रावणकी सभामें पहुँचनेपर हनूमान्‌जी उससे कहते हैं—] ‘हे रावण ! यदि भगवान् राम युद्धमें कुपित हो गये तो ऐसा सामर्थ्यवान् कौन देवता या असुर है जो उनके कालके दाँतोंसे भी पैने बाणोंको सहन कर सके ? ॥ १ ॥ तुमने अपने तपोबल, बाहुबल और स्नेहबलसे शिव और ब्रह्माजीको भी अच्छी तरह सन्तुष्ट किया है। अब उसके फलस्वरूप तथा अपने ही पोषित किये राजसमाज, पुत्र-पौत्रादि तथा सेवकोंको स्वयंही नष्ट न करो ? ॥२॥ राजा जनकरूप साहने तीनों लोकोंके शूरवीरोंको एकत्र कर उनके बलोंको पिनाकरूप तराजूसे अच्छी अच्छीतरह तौल लिया था; किन्तु वहाँ भगवान् रामके सामने परशुराम-जैसे शूर-शिरोमणि भी एक क्षणमें खेतके धोखे बन गये; [अर्थात् केवल देखनेमात्रके रह गये] ॥ ३ ॥ कलहीकी बात है' तनिक बालिकी गतिका ही विचार कर लो और अपने (हृदयके) झरोखेको खोलकर (उसके प्रकाशमें) हिताहितका विचार कर लो। देखो, अपने कुमन्त्रियोंकी बात मत मानना, इसमें बड़ी हानि होगी, अपने चित्तमें इन्हें त्रिदोषग्रस्त