गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगीतावली २८८ मनोरथ पूर्ण कर दिया और स्वार्थ तथा परमार्थ भी पूरा कर दिया। मैं पाप और अवगुणोंकी कोठरी थी, जिसे आपने कृपा करके आनन्द और मङ्गलसे भर दिया।' उस समय तपस्वी, किरातिनी और कोल आदि वनवासियोंने प्रभुकी मृदुल और मनोहर मूर्ति हृदयमें धारण की तथा प्रभुको सिर नवा, उनकी आज्ञा पा, भक्तिरूप परमधन प्राप्त कर अपने-अपने धामोंको गये ॥ ७ ॥ सिय-सुधि सब कही नख-सिख निरखि निरखि दोउ भाइ। दै दै प्रदच्छिना करति प्रनाम, न प्रेम अघाइ ॥ अति प्रीति मानस राखि रामहि, राम-धामहि सो गई । तेहि मातु-ज्यों रघुनाथ अपने हाथ जल-अंजलि दई ॥ तुलसी-भनित, सबरी-प्रनति, रघुबर-प्रकृति करुनामई । गावत, सुनत, समुझत भगति हिय होइ प्रभुपद नित नई ॥ ८ ॥ शबरीने दोनों भाइयोंको नखसे शिखातक देख-देखकर उन्हें सीताजीका सारा समाचार सुना दिया। चलते समय उसने भगवान्की बारम्बार प्रदक्षिणा कर उन्हें प्रणाम किया; उस समय उसका हृदय प्रेमसे अघाता नहीं था। इस प्रकार अत्यन्त प्रीतिपूर्वक हृदयमें भगवान् रामको धारणकर वह भगवान्के धामको चली गयी। तब रघुनाथजीने उसे माताके समान अपने हाथोंसे जलाञ्जलि दी। तुलसीदासकी कविता, शबरीकी विनय और रघुनाथजीका करुणामय स्वभाव गाने, सुनने और समझनेसे हृदयमें प्रभुके चरणोंकी नित्य नयी भक्ति होती है ॥ ८ ॥